योग पर निबंध (Yoga Essay In Hindi)

आज हम योग पर निबंध (Essay On Yoga In Hindi) लिखेंगे। योग पर लिखा यह निबंध बच्चो (kids) और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

योग पर लिखा हुआ यह निबंध (Essay On Yoga In Hindi) आप अपने स्कूल या फिर कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल कर सकते है। आपको हमारे इस वेबसाइट पर और भी कही विषयो पर हिंदी में निबंध मिलेंगे, जिन्हे आप पढ़ सकते है।


योग पर निबंध (Yoga Essay In Hindi)


प्रस्तावना

योग हमारे स्वास्थ को स्वस्थ रखने की वो क्रिया है, जिसके करने से ना केवल हम शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहते है। योग को निरन्तर अभ्यास द्वारा किया जाता है।जब इसे सही तरीके से करने की प्रक्रिया हमे आ जाती है, तो समझो हम योग में निपुण हो गए।

योग से बड़ी-बड़ी बीमारी का अंत किया जा सकता है। परन्तु इसको करने का तरीका सही ओर सटीक होना चाहिए। नही तो  कभी-कभी सही ज्ञान ओर सही शिक्षक ना हो, तो योग का गलत असर हमारे शरीर ओर स्वास्थ पर दिखने लगता है। इसलिए सही गुरु ओर सही ज्ञान के आधार पर ही योग किया जाना चाहिए।

योग का अर्थ

योग का अर्थ होता है जोड़ना, यानी एक जीवात्मा का परमात्मा से मिल जाना, पूरी तरह से एक हो जाना ही योग कहलाता है। चित यानी अपने मन को एक जगह स्थापित करना और उसे कहि भटकने ना देना ही योग कहलाता है।

योग की परिभाषा

योग पर विभिन्न तरह से कई महान व्यक्तियों ने योग को परिभाषित किया है। योग शब्द एक अति महत्वपूर्ण शब्द है, जिसे अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया है। उन महान व्यक्तियों में से कुछ के नाम इस प्रकार है।

योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि, महर्षि याज्ञवल्क्य, मैत्रायनयुपनिषद, योगपिखोपनिषद, श्रीमद भगवतगीता में योगेश्वर श्री कृष्ण, रांगेय राघव, लिंडग पुराण, अग्निपुराण, स्कन्दपुराण, हठयोग प्रदीपिका।

“इस प्रकार योग शब्द संस्कृत धातु ‘यूज’ से बना है। योग का अर्थ है जोड़ना, किसी भी कार्य में कुशलता प्राप्त करने के लिए शरीर को मन से तन से ओर आत्मा से जोड़ने का मतलब योग कहलाता है।”

हम यहां पर सभी महान योग के ज्ञाता को परिभाषित नही कर सकते है। इनमे से कुछ की परिभाषा इस प्रकार है।

योग सूत्र के प्रणेता महृषि पतंजलि 

“योगचित्तव्रतीनिरोध” अर्थात चित्त की वर्तीत्यो का निरोध करना ही योग है। चित्त का तात्पर्य अन्तःकरण से है। ब्रह्मकर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ जब विषयो का ग्रहण करती है तो मन उस ज्ञान को आत्मा तक पहुचाता है।

आत्मा साक्षी भाव से देखता है। बुद्धि व अहंकार विषय का निश्चय करके उसमे कर्तव्य भाव लाते है। इस सम्पूर्ण क्रिया से जो चित्त में जो प्रतिबिम्ब बनता है, वही व्रती कहलाता है। यह चित्त का परिणाम है। चित्त दर्पण के समान है। अतः विषय उसमे आकर प्रतिबिंब होता है। अर्थात चित्त विष्याकार हो जाता है। चित्त विष्याकार होने से रोकना ही योग कहलाता है।

योग का महत्व

पुराने समय में योग को जो सन्यासी होते थे उनका मोक्षमार्ग का साधन ही समझा जाता था। तथा योगाभ्यास के लिए साधक घर को छोड़कर वन में जाकर एकांत में वास करना पसंद करते थे, इसलिए योगसाधना को बहुत दुर्लभ ही समझा जाता था।

जिससे ये समझा जाने लगा की हर कोई योग की साधना प्राप्त नही कर सकता है ओर कोई भी सामाजिक व्यक्ति इस साधना को प्राप्त नही कर सकता है। जिसके स्वरूप योग शिक्षा विलुप्त सी हो गई। परन्तु तनाव, परेशानी, चिंता, प्रतिस्पर्धा को देखते हुए लोग फिर से योग का उपयोग करने लगे है ओर उससे कई लाभ प्राप्त कर रहे है।

योगविद्या फिर से समाज में लोकप्रिय हो रही है। आज की जीवन शैली से मनुष्य बहुत तनाव में गिर गया है। इस बजह से वो फिर योग की तरफ अपना मुख कर रहा है ओर ये केवलं भारत देश में ही नहीं अपितु पूरे विशव में योग का असर हो रहा है।

इसपे कई शोधकार्य किये जा रहे है ओर इससे लाभ प्राप्त कर रहे है। जिस प्रकार मोक्ष प्राप्त करने के लिए योग किया जाता था, वही इसके साधारण मनुष्य भी फायदा उठा रहा है।

योग की विशेषता

अच्छा स्वास्थ वरदान होता है। अच्छे स्वास्थ से ही अनेक प्रकार की सुख सुविधाएं प्राप्त की जा सकती है। जो व्यक्ति अच्छे स्वास्थ तथा स्वस्थ शरीर के महत्व को नकारता है तथा ईश्वर के इस वरदान का निरादर करता है। वह अपना ही नहीं ,समाज तथा राष्ट्र का भी अहित करता है।

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास हो सकता है। जिस व्यक्ति का शरीर ही स्वस्थ नही, फिर उसका मस्तिष्क भला कैसे स्वस्थ रह सकता है। स्वस्थ मस्तिष्क के अभाव में व्यक्ति कितना पंगु है, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

मनुष्य की दशा उस घड़ी के समान है। जो यदि ठीक तरह से रखी जाए तो सो वर्ष तक काम दे सकती है ओर यदि लापरवाही से बरती जाए तो शीघ्र बिगड़ जाती है। व्यक्ति को अपने शरीर को स्वस्थ तथा काम करने योग्य बनाये रखने के लिए व्यायाम आवश्यक है।

व्ययाम ओर स्वास्थ का चोली दामन का साथ है। योग से ना केवल हमारा शरीर पुष्ठ होता है, अपितु मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहता है। रोगी शरीर में स्वस्थ मन निवास नही कर सकता है। यदि मन स्वस्थ ना हो तो विचार भी स्वस्थ नही हो सकता है। ओर जब विचार स्वस्थ नही होंगे तो कर्म की साधना केसी होगी।

कर्तव्यों का पालन कैसे होगा, शरीर को चुस्त पुष्ठ ओर बलिष्ठ बनाने के लिए योग आवश्यक है। इसलिए अपने विचार को बलिष्ठ बनाना है। तो योग अवश्य करे। योग न करने वाले मनुष्य आलसी तथा अकर्मण्य बन जाता है। आलस्य को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहा जाता है।

आलसी व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में असफल होते है तथा निराशा में डूबे रहते है। योग के अभाव में शरीर बोझ सा प्रतीत होता है, क्योंकि यह बेडौल होकर तरह-तरह के रोगों को निमंत्रण देने लगता है। मोटापा अपने आओ में एक बीमारी है, जो ह्रदय रोग, डायबिटीज, तनाव तथा रक्तचाप जैसी बीमारियों को जन्म देती है।

इसलिए आलस को दरमिनार करके योग का सहारा लेना चाहिए। क्योंकि योग से अगर हमें कोई फायदा भले ही ना हो, पर ऐसा कम ही होता है। तो नुकसान तो बिलकुल नहीं होता है।इसलिए हमे हमारे जीवन में योग को उतार कर स्वस्थ रहना चाहिए।

योग के लाभ

(1) योग करने से शरीर स्वस्थ रहता है।

(2) योग ना केवल मानसिक बल्कि शारीरिक लाभ प्रदान करता है।

(3) योग से रक्त संचार बढ़ता है।

(4) योग से बुढ़ापा जल्दी हमारे शरीर को नही घेरता है।

(5) योग से शरीर हल्का-फुल्का चुस्त तथा गतिशील बना रहता है।

(6) योग से कसरत करने की क्षमता बढ़ती है ओर शरीर स्वास्थ रहता है।

(7) योग से व्यक्ति कर्मठ बनता है।

(8) योग से जीवन उल्लासपूर्ण ओर सुखी रहता है।

(9) योग करने वाला व्यक्ति हंसमुख, अस्तमविश्वासी, उत्त्साहि तथा निरोग रहता है।

(10) सबसे श्रेष्ठ योग व्यायाम है।

(11) योग करने वाले के चहरे पर एक अलग ही तेज रहता है।

(12) योग से लाभ भी तभी होंगा जम इसे सही प्रकार से करेंगे।

योग से हानियाँ

(1) ज्यादा देर तक योग करने से मांसपेशियों तथा बल्डनर्वज में खिंचाव आता है।

(2) योग का अभ्यास आवश्यकता से अधिक करने से शरीर को नुकसान पहुचता है।

(3) मांसपेशियों पे खिंचाव उतपन्न होता है। नतीजन शरीर के उस हिस्से पर दर्द होता है ओर अगर ध्यान ना दिया जाये, तो वह हिस्सा लकवाग्रस्त हो सकता है। इसलिए योग को भी कुछ समय अनुसार ही करना चाहिए।

(4) यदि आपको योग करते वक्त झपकी की आवश्यकता होती है। तो इसका मतलब आप अपनी क्षमता से अधिक योग कर रहे है।

(5) अत्यधिक योग करने से चक्कर आना, थकान महसूस होना, अत्यधिक कमजोरी आना अगर ये सब होता है। तो इसका मतलब आप हद से ज्यादा योग कर रहे है।

(6) कुछ लोगो के लिए योग एक आदत बन जाती है ओर अगर वो व्यक्त्ति योग नही करता, तो उसका मन कहि ओर नही लगता है। योग का दीवाना उसे बीमार भी कर सकता है।

योग के जन्मदाता कोन है?

योग के जन्मदाता महाऋषि पतांजलि को माना जाता है। पर ये भी सत्य या यह कह सकते है कि सही से नही पता है। फिर भी जब भी योग की बात आती है, तो पतंजलि का नाम प्रमुख रूप में लिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि पतंजलि ही एकमात्र व्यक्ति थे, जीन्होंने होने योग को आस्था, अंधविश्वास ओर धफम से बाहर निकालकर योग को एक सुव्यवस्थित रूप दिया था।

जबकि योग तो प्राचीनकाल से ही साधु संतों के मठो में किया जाता रहा है। आदिदेव शिव जी और गुरु दत्तात्रेय को योग का जनक माना गया है। शिव जी के सात शिष्यों ने योग का धरती पर प्रचार किया था।

योग के प्रकार

हमारे यहाँ के ऋषि मुनि जब वनों में आद्यात्मिक की खोज के लिए जाते थे। तो कई समय तक वनों में भटका करते थे ओर योग साधना करा करता थे। परंतु जब वो पशु पक्षियो को देखते थे, तो उनमे वो योग की क्रिया को देखते थे। उन्हें देखकर सोचते थे की इस पक्षियो को ना तो सर्दी ओर ना ही बुखार आदि होता है, जिस प्रकार हम मनुष्य को होता है।

फिर उन्होंने गहराई से जाकर देखा तो पता चला की उनके बैठने का तरीका, खाने के तरीका ओर पानी पिने का तरीका बहुत ही भीन्न ओर सही है। जो की हम मानव को भी करना चाहिए। ओर तो ओर हम अब उनकी ही प्रक्रिया योग में ओर अपने जीवन में उतार रहें है।

देखिए जिन्हें हम जानवर कहते है।उन्हें बिना बताये ओर सिखाये ही कितना ज्ञान है। वो पानी धीरे धीरे पीते है। खाते है तो चबा चबा कर खाते है। ये उन्हें सिखाया नही जाता ओर उनके इसी तरह से रहने की क्रिया ने कई योग को जन्म दिया। वैसे तो योग को हम 6 भागो में बाट सकते है, जो कुछ इस प्रकार है।

(1) पशुवत आसन

मयूर आसन, भुजंगासन, सिहासन, शलभासन, मत्यासन, बकासन, काकासन, उल्लुक आसन, हंसासन, गरुणासन ये सभी आसन पशु पक्षियो को देखकर ओर उनके उठने बैठने की क्रिया ही है ओर नाम भी उन्ही के नाम पर आधारित है।

(2) वस्तुवत योग आसन

धनुरासन, हलासन, वज्रासन, तोलासन, नोकासन, दंडासन, शिलासन, अर्ध्धनुरासन, उधर्वधनुर आसन, विपरीत नोकासन इस प्रकार के आसन निर्जीव वस्तुओं को देखकर बनाये है।

(3) प्रकृति योग आसन

हमारे आस-पास के वातावरण में प्रकृति की सुंदरता से जुड़े कुछ आसन इस प्रकार है। लतासन, पदमासन, वृक्षासन, ताड़ासन, मंडूकासन, अर्धचंद्रास, तलाबासन, पर्वतासन, अधोमुख वृक्षासन, अनंतासन।

(4) अंग या मुद्रावत योग आसन

मनुष्य के अंग ओर उनके बैठने उठने की मुद्रा को योग का नाम दिया है। वो इस प्रकार है। सर्वागासन, पादहस्तासन, सलम्ब सर्वागासन, शीर्षासन, विपरीतकर्णी सर्वागासन, मेरुदंडासन, सुप्तपादसनगुष्ठासन, कटिचक्रासन, मलासन, प्रनमुक्तासन, भुजपीडासन।

(5) योगिनाम योग आसन

इस प्रकार के आसन किसी योगी, संत या किसी देवता के नाम पर आधारित है। जैसे महाविरासन, हनुमानासन, ब्रहामुद्रासन, भारद्वजआसन, वीरासन, वीरभद्रासन, वशिष्ठआसन, धुव्रासन, मत्स्येन्द्रासन, भैरवासन।

(6) अन्य प्रकार के आसन

वीरासन, पवनमुक्तासन, सूखासन, योगमुद्रा, वक्रासन, स्वस्तिकासन, वतायनासन, पासासन, उपविष्ठ कोणासन, बन्धकोणासन।

उपसंहार

इस प्रकार योग हमारे स्वास्थ के लिए अतिउत्तम कारक है। इनको अपना कर हम हमारे स्वास्थ को स्वस्थ रख सकते है। योग हमारे जीवन की वो अमूल्य धरोहर है। अगर एक बार सही तरीका ओर सही प्रकार से हमे करना आ गया, तो योग ना केवल हमारे जीवन को स्वस्थ रख सकता है बल्कि बीमारियों का तो नामोनिशान भी नहीं दिखेगा।

परंतु योग की एक शर्त है की सही ज्ञान ओर सही तरीके से ही किया जाना चाहिए, तभी योग का पूर्ण लाभ हमे मिलता है।


तो यह था योग पर निबंध, आशा करता हूं कि योग पर हिंदी में लिखा निबंध (Hindi Essay On Yoga) आपको पसंद आया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा है, तो इस लेख को सभी के साथ शेयर करे।

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