राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पर निबंध (Mahatma Gandhi Essay In Hindi)

आज के इस लेख में हम महात्मा गाँधी पर निबंध (Essay On Mahatma Gandhi In Hindi) लिखेंगे। महात्मा गाँधी पर लिखा यह निबंध बच्चो और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

महात्मा गांधी एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हमारे देश के लिए काफी बलिदान दिए। महात्मा गांधी जी ने अहिंसा के मार्ग पर चलकर हमारे भारत देश को आजादी दिलाई। आज हम इसी महान इंसान पर लेख लिखने जा रहे हैं।

महात्मा गाँधी पर लिखा हुआ यह निबंध (Essay On Mahatma Gandhi In Hindi) आप अपने स्कूल या फिर कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल कर सकते है। आपको हमारे इस वेबसाइट पर और भी कही विषयो पर हिंदी में निबंध मिलेंगे, जिन्हे आप पढ़ सकते है।


राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पर निबंध (Mahatma Gandhi Essay In Hindi)


महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) भगवान राम, भगवान कृष्ण, यशु और अशोका की तरह ही सपना रखते थे। वह इन की तरह ही सोच रखते थे। बीसवीं सदी में ऐसा कोई भी नहीं था जो महात्मा गांधी जी के व्यक्तित्व की तुलना कर सकें।

इस धरती पर जितने भी दिग्गज आये थे वह किसी मकसद से आए थे। उसी तेरह गांधीजी भी एक मकसद लेकर इस धरती पर आए थे। और वह मकसद था भारत को स्वतंत्रता दिलाना।

यह बहुत ही दुख भरी बात है कि महात्मा गांधी जिन्होंने हमें गुलामी से छुटकारा दिया। उन्हें ही इन गौरव के दिनों का आनंद लेने का अवसर नहीं मिला।

उनका जो सपना था कि भारत एक मजबूत और एकत्रित राष्ट्र बनेगा वह उनके जीते जी पूरा नहीं हुआ। क्योंकि गांधीजी ज्यादा समय के लिए हमारे साथ इस दुनिया में नहीं रहे। जिससे वह भारत को प्रगति के राह पर आगे बढ़ते हुए नहीं देख पाए।

महात्मा गांधी इनका व्यक्तित्व इतना तेजस्वि था की ना बल्कि वह अमीर लोगों को आकर्षित करते थे बल्कि वह गरीबों को भी प्रेरित करते थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि महात्मा गांधी हजारों व्यक्तित्व वाले इंसान थे। गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर १८६९ में हुआ था। महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर गुजरात में हुआ था।

महात्मा गांधी के पिता का नाम करमचंद गांधी था। करमचंद गांधी यह पोरबंदर के चीफ मिनिस्टर थे। वह पूरी तरह से योग्य इंसान नहीं थे। लेकिन वह दिल्ली के लिए अच्छे प्रशासक थे। करमचंद गांधी जी को उनके काम बहुत ही अच्छी तरीके से आते थे।

गांधी जी के मां का नाम पुतलीबाई था। गांधी जी की मां बहुत ज्यादा धार्मिक महिला थी जिनोह्णे गांधी जी को काफी प्रभावित किया था। यह गांधी जी की मां की पवित्रता और सत्यता थी जिसने उन्हें गलत बातों को त्यागना और उसका विरोध करना सिखाया।

वह खुद से उनके किए गए गलतियों को मान लेते थे। गांधी जी को वैष्णो धर्म और जैन धर्म के सिद्धातो पर लाया गया था। यह दोनों धर्म अहिंसा और किसी भी जीवित व्यक्ति या प्राणियों को चोट ना पहुंचाने के सिद्धांतों का समर्थन करते थे।

महात्मा गांधी जी विद्यालय में एक औसत विद्यार्थी थे। हर सामान्य बच्चे की तरह उनके पास बचपन और किशोर भाग जाने का अपना हिस्सा था। मगर महात्मा गांधी ने ऐसे अपराधों को कभी ना करने का संकल्प कर लिया था और उन्होंने खुद को सुधारने की कोशिश की।

महात्मा गांधी जी की शादी जब वह 13 वर्ष के थे तभी कस्तूरबा जी के साथ हो गई थी। सन १८८७ मैं वह सिर्फ मैट्रिक खत्म कर पाए थे। उन्होंने अपनी मेट्रिक “यूनिवर्सिटी ऑफ मुंबई” से की थी। इसके बाद वह समलदस कॉलेज जोकि भावनगर में है उसमें शामिल हो गए।

महात्मा गांधी अपने कॉलेज में बिल्कुल खुश नहीं थे। क्योंकि उन्हें गुजराती की जगह इंग्लिश लेनी पड़ी। इसलिए जब महात्मा गांधी जी के परिवार ने उन्हें कानून की शिक्षा का अध्ययन करने के लिए लंदन जाने को कहा तो उसे वह मना नहीं कर पाए।

उसके बाद उन्होंने सितंबर १८८८ में कवियों की भूमि के लिए रवाना हुए। उसके बाद उन्होंने लंदन के 4 लॉ कॉलेजों मे से एक कॉलेज इनर temple में प्रवेश लिया। उन्होंने जोर देकर इंग्लिश और latin तो ले ली लेकिन उन्हें वेस्टर्न सोसाइटी में समायोजित होने में काफी मुश्किल हुई।

खास करके उन्हें शाकाहारी होने की वजह से वेस्टर्न सोसाइटी में रहने मे दिक्कत आयी। लेकिन महात्मा गांधी वहां पर एडवर्ड कारपेंटर, G. B. Shaw, Annie Besant जैसे लोगों से मिले, जो उनके व्यक्तित्व को आकार देने में सहायक थे और उन्हें भारत में स्वतंत्रता संग्राम की अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया करते थे।

जब महात्मा गांधी इंग्लैंड में थे उस वक्त उनकी मां का देहांत हो गया था। जब वह जुलाई १८९१ में भारत लौटे थे, तब उन्होंने उनकी प्रैक्टिस मुंबई में शुरू करने की कोशिश की थी। लेकिन वह उस में असफल रहे।

उसके बाद महात्मा गांधी राजकोट में आ गए वहां उन्होंने याचिकाओं के लिए मसौदा तयार करने का काम शुरु किया।

यही वह वक्त था जब उन्हें अवसर मिला साउथ अफ्रीका जाने का। उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाने का मौका एक भारतीय कंपनी से 1 साल के अनुबंध से मिला था जोकि नेटल दक्षिण अफ्रीका में आधारित था।

यहां पर उन्होंने देखा कि कैसे अलग-अलग रंगों के लोगों के साथ वाइट गवर्नमेंट अमानवीय व्यवहार करते थे। एक बार जब वह प्रीटोरिया के लिए सफर कर रहे थे। तो उन्हें रेलवे के फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में से उनके सामान के साथ बाहर निकाल दिया गया। और इसका कारण था कि उन्होंने यह हिम्मत की थी कि गोरे लोगों के लिए जो कंपार्टमेंट रिजर्व था उस पर उन्होंने कब्जा करने का साहस किया था।

महात्मा गांधी जी को इस हादसे ने अमानवीय कार्यों के खिलाफ नेतृत्व करने और अन्याय के खिलाफ बोलने और लड़ने के लिए संकल्पित किया। महात्मा गांधी जी ने लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में बताने की बहुत कोशिश की मगर उन्हें बीच में ही इंडिया वापस आना पड़ा। क्योंकि उनका 1 साल का कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो चुका था। उनका कॉन्ट्रैक्ट जून 1894 में खत्म हुआ था।

गांधी जी ने लोगों को नेटल विधानसभा में पेश किए जाने वाले बिल के खिलाफ प्रदर्शन करने को कहा। यह बिल भारतीयों को वोट देने के अधिकार से वंचित रखने के लिए था।

उस वक्त लोगों ने गांधीजी में एक नेता को देखा। इसलिए उन्होंने उनसे वापस रहने के लिए कहा। गांधीजी को राजनीति में कभी कोई दिलचस्पी नहीं थी और वह पब्लिक में लोगों के सामने बात करने से भी डरते थे।

लेकिन जुलाई १८९४ में लोगों ने उन्हें एक सक्रिय राजनीतिक प्रचारक के रूप में देखा। उस वक्त गांधी जी सिर्फ २५ साल के थे। फिर भी वह बिल्कुल पारित होने से नहीं रोक पाए। गांधीजी बहुत सारा समर्थन जुटाने और उसे व्यवस्थित करने में सक्षम थे और वह नेटल, इंग्लैंड और भारत में प्रेस द्वारा देखा गया था।

उसी वर्ष गांधी जी ने भारतीय समुदाय को एकत्रित करने के लिए नटाल भारतीय कांग्रेस संस्था की स्थापना की। इंग्लिशमैन ऑफ कोलकाता, टाइम्स ऑफ लंदन और स्टेट्समैन नटल भारतीयों के की हुई शिकायतों की आवाज उठाई।

१८०६ में महात्मा गांधी अपनी पत्नी और बच्चों को दक्षिण अफ्रीका ले जाने के लिए भारत लौटे थे। जब वह १८९७ में जनवरी को डरबन वापस आए तब उन पर एक सफेद भीड़ ने हमला कर दिया।

जब दोषियों को दंडित करने का सवाल उठा तो गांधी जी ने गलत कर्ता-धर्ता ओ के खिलाफ कोई भी मुकदमा चलाने से साफ इनकार कर दिया। जब १८९९ मैं दक्षिण अफ्रीका में बोयर युद्ध फैल गया तो उन्होंने स्वयंसेवकों का एक नियाम खड़ा किया। जिस नियान में बैरिस्टर, अकाउंटेंट, कारीगर और मज़दूर शामिल थे।

लेकिन गांधी जी के योगदान को दक्षिण अफ्रीका में यूरोपियन लोगों के द्वारा मान्यता नहीं दी गई थी। ट्रांसवाल सरकार ने उन्नीस सौ छह में एक ऐसा अध्यादेश पेश किया जो कि भारतीय आबादी के लिए विशेष रूप से अपमान जनक था।

उसी वर्ष सितंबर १९०६ में गांधी जी ने जोहान्सबर्ग मैं अध्यादेश के विरोध में एक सामूहिक रैली का आयोजन किया और अध्यादेश को गलत बताते हुए किसी भी सजा को स्वीकार करने की कसम खा ली।

इसी तरह सत्याग्रह का जन्म हुआ।दक्षिण अफ्रीका में उनका यह संघर्ष ७ साल से ज्यादा समय के लिए चलता रहा। भारतीय समुदाय ने भी स्वेच्छा से गांधी जी का समर्थ किया और उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचारों से किये जाने वाले संघर्ष में भाग लेने से रोका नहीं गया।

इस संघर्ष का अंत तब हुआ जब भारत और ब्रिटेन की सरकार ने हस्तक्षेप किया और दक्षिण अफ्रीका सरकार ने एक समझौता स्वीकार किया। गांधी जी ने जो गतिविधियां दक्षिण अफ्रीका में कि उसकी वजह से ना केवल उन्हें भारत में लोग जानने लगे बल्कि अन्य ब्रिटिश उपनिवेशो के लोग भी उन्हें जानते थे।

जब वह १९१५ में भारत लौटे तो उन्हें एक सम्मानित नेता की तरह सराहा गया। भारत के बड़े व्यापारी वर्ग ने भारत में कांग्रेस नामक एक संगठन का गठन किया। उनके पास ब्रिटिश सरकार को याचिका देने के अलावा कोई एजेंडा नहीं था।

दक्षिण अफ्रीका में किए गए सत्याग्रह की वजह से भारत में स्वतंत्रता संग्राम को एक नई गति मिली। जब गांधी जी भारत लौटे तो भारत के नेताओं के साथ ही भारत के लोगों ने भी उनका खुले हाथों से स्वागत किया।

भारतीयों ने गांधी जी को एक ऐसे नेता के रूप में पाया था जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए लोगों के ताकत का इस्तेमाल किया। लेकिन गांधीजी का संघर्ष जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। भारत में उससे बिल्कुल अलग था।

भारत के सभी लोग जाति धर्म से बेपरवाह होकर गांधीजी के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। चंपारण, रौलट एक्ट और खिलाफत आंदोलन के साथ, वह पूरे भारत के लोगों को शामिल करने में सक्षम थे और इसी तरह भारत में कांग्रेस के बेजोड़ नेता बन गए।

गांधी जी की उस समय बिलकुल वैसे ही जैसे कृष्ण की महाभारत में थी। बिना किसी हथियार को चलाएं जिस तरह कृष्ण ने पांडवों को जीत दिलाने के लिए कदम रखा था वही स्थिति गांधीजी की थी।

गांधी जी पहले से कांग्रेस का हिस्सा नहीं थे। जब गांधी जी भारत लौटे तो वह सर फिरोजशाह मेहता, लोकमान्य तिलक और गोखले जैसे भारतीय नेताओं से मिले और राष्ट्र का दौरा किया।

उनकी की गई पहली सत्याग्रह क्रांति बिहार के चंपारण में हुई थी। यहा किसानों को अंग्रेजों के लिए इंडिगो की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था। यही वह जगह थी जहां महात्मा गांधी जी की मुलाकात बिहार के प्रमुख नेता जैसे राजेंद्र प्रसाद जी से हुई और उन्होंने गांधी जी को अपना पूरा समर्थन देने का संकल्प भी किया।

अगस्त १९१९ में गांधी जी ने रौलट एक्ट के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किया, जिस प्रदर्शन ने बिना किसी मुकदमे के अंग्रेजों को जेल में डाल दिया। गांधीजी ने पूरे देश में एक सत्याग्रह चलाया जिसमें पूरे देश के लोगों ने उनके इस संघर्ष में भाग लिया।

सन १९१९ के वसंत में अमृतसर में जलियांवाला बाग मैं ४००० लोगों की बैठक होने वाली थी।लेकिन उन लोगों को सैनिकों द्वारा निकाल दिया गया था और कहीं लोग मारे गए थे। इस घटना के होने से पूरा देश हिल गया था और फिर गांधीजी ने इस संघर्ष को बंद करने का फैसला किया।

१९२० तक गांधी जी देश के प्रमुख नेता बन गए। गांधीजी का मानना था कि अंग्रेजों द्वारा हम शासित हो रहे हैं इसका कारण हमारी कमजोरी है। उन्होंने सरकारी सेवाओं का बहिष्कार करने के लिए छात्रों को कहा और असहयोग आंदोलन चलाया।

इसकी प्रतिक्रिया बहुत ज्यादा थी। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां होने के बावजूद भी आंदोलन उठता गया। फरवरी १९२२ में एक हिंसक भीड़ ने चौरी चौरा में एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी। जिसकी वजह से २२ पुलिसकर्मी मारे गए थे। यह देखने के बाद गांधीजी ने आंदोलन को बंद करने का फैसला किया।

उन्हें मार्च १९२२ में गिरफ्तार किया गया लेकिन १९२४ में बीमार होने की वजह से उन्हें रिहा कर दिया गया था। इस दौरान भारत में हिंदू और मुसलमानों के बीच और असहमति पैदा होने लगी। गांधी जी ने हिंदू और मुसलमान समुदायों को उनकी कट्टरता का त्याग करने के लिए मनाने की कोशिश की।

१९२४ में गांधी जी ने लोगों को उस वक्त अहिंसा के मार्ग पर चलवाने के लिए ३ सप्ताह का उपवास किया। ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन को १९२७ में सुधार आयोग का प्रमुख नियुक्त किया। कांग्रेस और अन्य दलों ने आयोग का बहिष्कार किया क्योंकि इसमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था।

गांधीजी ने १९२८ में कोलकाता कांग्रेस की बैठक में भारत के लिए राज्य का दर्जा देने की मांग की। गांधीजी ने मार्च १९३० में नमक पर कर लगाने के विरोध में दांडी मार्च शुरू किया। अंग्रेजो के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अहिंसक हड़ताल में ६०००० लोग कैद थे।

१९३१ में लॉर्ड इरविन के साथ बातचीत करने के बाद गांधी जी ने हड़ताल को बंद कर दिया और राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए इंग्लैंड जाने को वह तैयार हो गए। सम्मेलन एक बड़ी निराशा थी क्योंकि यह भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण के मुद्दे की बजाय भारत में अल्पसंख्यक समुदायों की दुर्दशा पर केंद्रित था।

उसके बाद भारत में वापस से लॉर्ड विलिंगडन ने लॉर्ड इरविन का स्थान लिया। एक ब्रिटिश वायसराय ने गांधीजी के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने की कोशिश की जिसे कैद कर लिया गया।

१९३२ में सितंबर को उन्होंने नए संविधान में अलग-अलग मतदाताओं को आवंटित करके और अछूतो को अलग करने के अंग्रेजों के प्रयास के विरोध में उपवास किया था। उन लोगों के खिलाफ भेदभाव को रोकने के लिए गांधीजी ने एक जन अभियान शुरू किया था।

गांधीजी ने उन्हें हरिजन कहा। जिसका मतलब ईश्वर की संतान था। १९३४ में गांधी जी ने कांग्रेस के नेतृत्व और सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। क्योंकि उन्होंने महसूस कर लिया था कि सदस्यों ने राजनीतिक कारणों से अहिंसा की नीति अपनाई थी।

उसके बाद गांधीजी मध्य भारत के एक गांव सेवाग्राम में गए और समाज के कमजोर वर्गों के उस्थान पर ध्यान केंद्रित किया।

जब १९३९ में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। तो यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण चरण था। गांधीजी चाहते थे कि अंग्रेज भारत से चले जाए और अंग्रेजों को भारत से हटा दिया जाए।

उसकी लिए गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन चलाया जो बहुत बड़ा आंदोलन था। हिंसक प्रकोप हुए और आंदोलन को रोकने का प्रयास भी किया गया।

जब १९४५ में युद्ध खत्म हो गया और ब्रिटेन में हुए चुनाव को लेबर पार्टी ने जीत लिया तो उन्होंने भारत को स्वतंत्रता देने का फैसला ले लिया। लेकिन मुस्लिम लोग अपने लिए एक अलग राज्य चाहते थे। इसके लिए अगले 2 वर्षों तक कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लोग और ब्रिटिश सरकार के बीच त्रिपक्षीय वार्ता हुई।

अगस्त के मध्य में, वार्ता में एक सफलता मिली जब भारत को पाकिस्तान के मुस्लिम राज्य के रूप में विभाजित करने का निर्णय लिया गया। इस विभाजन के साथ दोनों पक्षों में निर्दोष लोगों का सामूहिक पलायन और नरसंहार हुआ था।

इस पर वार्ता शुरू होने से पहले ही बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। इन घटनाओं ने महात्मा गांधी जी को बहुत पीड़ा दी। गांधी जी ने खुद को सांप्रदायिक संघर्षों से प्रभावित इलाकों को ठीक करने के काम में डूबा दिया। गांधीजी दिल्ली और कोलकाता में सांप्रदायिक त्रासदी लाने में सक्षम थे। वह प्रार्थना सत्र आयोजित करते थे।

३० जनवरी १९४१ को जब गांधी जी को दिल्ली के बिरला हाउस में प्रार्थना कक्ष में ले जाया जा रहा था। तो उस वक्त एक ऐसी घटना घटी जो बहुत दुखद थी।

जब उन्हें प्रार्थना कक्ष में ले जाया जा रहा था तो उनकी हत्या एक हिंदू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने कर दी। गांधीजी ने अपनी अंतिम सांस हे राम शब्दों के साथ ली। यह ऐसा दिन था जिस दिन शांति, सत्य और अहिंसा का प्रतीक हमेशा के लिए चला गया था।

राज घाट विस्थापित उनका स्मारक आज भी दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करता है। महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्ति दुनिया में एक ही थे जो अपने आखिरी सांस तक भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए अहिंसा के मार्ग पर चले।


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तो दोस्तों यह थी महात्मा गाँधी जी की कहानी और महात्मा गाँधी जी पर निबंध, आशा करता हूं कि महात्मा गाँधी पर हिंदी में लिखा निबंध (Hindi Essay On Mahatma Gandhi) आपको पसंद आया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा है, तो इस लेख को सभी के साथ शेयर करे।

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