पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निबंध (Pandit Jawaharlal Nehru Essay In Hindi)

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पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निबंध (Pandit Jawaharlal Nehru Essay In Hindi)


जब देश गुलामी की बेड़ियां तोड़कर आजादी की सांस ले रहा था, तब देश के सामने यह बढ़ा प्रश्न था कि देश की बागदोर कौन संभालेगा। तब महात्मा गाँधी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम सुझाया। इस तरह से पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने। देश जब आजाद हुआ था तब यह कई तरह की समस्याओं से घिरा हुआ था।

लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व ने देश को एक दिशा दी, जिस पर चलकर आज देश यहाँ तक पहुचा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व में ऐसी कई बातें थी, जो सीखने लायक है। जैसे महात्मा गांधी के प्रति निष्ठा का भाव, देश की सेवा करने का भाव, और बच्चों को दुलार करने का भाव।

यही सब बातें आज भी पंडित जवाहरलाल नेहरू को हम सबके बीच जीवंत कर देती हैं। हालांकि आज कई ऐसे वर्ग भी हैं जो पंडित नेहरू को कश्मीर और देश के कुछ अहम जगहों के लिए गलत नीतियों का जिम्मेदार भी ढहराते हैं।

लेकिन एक शासक के रूप में कुछ उपलब्धियां और कुछ इल्जाम हर व्यक्ति को उठाना ही पड़ता है। ऐसे में जवाहरलाल नेहरू किसी से अलग नही है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू का प्रारंभिक जीवन

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को प्रयागराज (इलाहाबाद) में हुआ था। इनके माता-पिता स्वरूप रानी और मोतीलाल नेहरू थे। इनका परिवार सारस्वत ब्राम्हण थे, जो कश्मीर के रहने वाले थे। हालांकि वकालत की प्रैक्टिस करने के चलते इनके पिता मोतीलाल नेहरू को प्रयागराज आना पड़ा।

जवाहरलाल नेहरू की दो छोटी बहन भी थी, जिनका नाम विजयालक्ष्मी पंडित और कृष्णा पंडित है, जवाहरलाल तीनों में सबसे बड़े थे। जवाहरलाल नेहरू जिस घर मे रहते थे, उसका नाम आनंद भवन था, जो कि आज भी प्रयागराज में स्थित है। यह बहुत आलीशान घर था।

मोतीलाल नेहरू समाज मे और अपने कार्यक्षेत्र में बहुत प्रतिष्टित व्यक्ति थे। उनका सम्मान सभी लोग करते थे। वो अपने दौर के एक बेहद ही सफल और मशहूर बैरिस्टर थे। मोतीलाल नेहरू की यह सोच थी कि वो अपने बच्चों को हर तरह की सुविधाएं दें, ताकि उन्हें किसी भी तरह की कमी न महसूस हो।

उन्होंने यह काम बखूबी किया भी था। अपने तीनों बच्चों को बिना किसी भेदभाव के पढ़ाई कराई और उन्हें अच्छा भविष्य दिया।

जवाहरलाल नेहरू की शिक्षा और कैरियर

जवाहरलाल नेहरू की पढ़ाई से किसी भी तरह का समझौता नही किया गया। उन्हें पढ़ाई के दौरान किसी भी चीज़ की जरूरत पड़ती तो वह उनके पास मौजूद होती थी। मोतीलाल नेहरू चाहते थे कि जवाहरलाल इंग्लिश में विशेष पकड़ रखे। इसलिए उन्होंने जवाहरलाल की पढ़ाई इंग्लिश टीचर्स के द्वारा घर मे ही शुरू करवाई।

हालांकि उन्हे साथ हिंदी और संस्कृत भाषा भी पढ़ाई जाती थी। पढ़ाने के साथ साथ उन्हें घर मे ही इंग्लिश बोलने की भी ट्रेनिंग दी जाती थी। मोतीलाल नेहरू को अंग्रेजी से कुछ ज्यादा लगाव था, इसीलिए मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल नेहरू का पहनावा भी कुछ अंग्रेजी स्टाइल का ही रखा था।

शुरुआती शिक्षा घर मे होने के बाद प्रारंभिक शिक्षा प्रयागराज के ही एक लोकल कान्वेंट स्कूल में शुरू की गई। जवाहरलाल 15 वर्ष की आयु तक भारत मे ही पढ़ाई करते रहे, लेकिन जब 15 वर्ष पूरे कर लिए तो उन्हें आगे की शिक्षा लेने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया।

ऐसा कहा जाता है कि इनके जीवन मे बचपन का बहुत गहरा असर पड़ा है। इनकी माँ धार्मिक प्रवत्ति की थी। हर भारतीय माँ की तरह वो भी कई तरह की धार्मिक चीज़े करती रहती थी।

लेकिन फिर भी जवाहरलाल पर इन सब का बहुत कम असर पड़ा। इनके पिता इतने ज्यादा धार्मिक नही थे। हालांकि वह पूर्ण रूप से नास्तिक भी नही थे। लेकिन ईश्वर में उनकी कम ही आस्था थी।

जवाहरलाल ने भी अपने पिता की तरह ही कानून की पढ़ाई की थी। इंग्लैंड में पढ़ाई पूरी करने के बाद वो वापस भारत आ गए, और प्रयागराज से वकालत की प्रैक्टिस करने लगे।मोतीलाल नेहरू पहले से ही एक बहुत प्रतिष्टित वकील थे। उनकी इस छवि का असर जवाहरलाल नेहरू के कैरियर में भी देखने को मिला।

पिता की छत्रछाया में उन्होंने अपने वकालत की शुरुआत की। देखते ही देखते जवाहरलाल नेहरू भी काफी प्रसिद्धि होने लगे जो कि उनके उनके और परिवार के लिए एक गौरव की बात थी।

जवाहरलाल नेहरू का वैवाहिक जीवन

जवालाल लाल नेहरू का वैवाहिक जीवन उनके कैरियर की तरह सफल नही रहा। इनका विवाह 1916 में सम्पन्न हुआ था। पढ़ाई के सिलसिले में जब जवाहरलाल नेहरू इंग्लैंड में थे तभी उनके माता पिता ने उनकी शादी करने का विचार कर लिया था।

उन्होंने अपने घर के लिए योग्य बहु की खोज शुरू की और उनकी खोज 1912 में कमला नेहरू पर पूरी हुई। कमला नेहरू 1912 में मात्र 13 वर्ष की थी इस वजह से विवाह के लिए 1916 तक इंतजार किया गया।

जब वो 17 वर्ष की हो गईं तो इन दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ। कमला कौल एक कश्मीरी ब्राम्हण परिवार से थी। कमला नेहरू ने 1917 में एक लड़की को जन्म दिया, जिनका नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी था। आगे चलकर यही देश की प्रधानमंत्री बनी और इंदिरा गाँधी नाम से जानी गईं।

कुछ साल बाद इन्होंने एक लड़के को भी जन्म दिया था, लेकिन वह मात्र कुछ ही सप्ताह तक जीवित रह सका।

कांग्रेस में आगमन और गाँधी जी से मुलाकात

मोतीलाल नेहरू पहले से ही भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सदस्य थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरू नही थे। इंग्लैंड से वापस आने के बाद जवाहरलाल वकालत करने लगे, लेकिन उनका मन नही लग रहा था।

दिल मे कुछ और करने की लालसा थी, तो उन्होंने काँग्रेस को जॉइन कर लिया। जवाहरलाल नेहरू के पिता न सिर्फ जाने माने वकील थे बल्कि उनकी अंग्रेजों के अफसर से भी अच्छी बनती थी।

उन्हें ब्रिटेन के कानून और न्याय पर बहुत भरोसा था। इसी वजह से अंग्रेजी अफसर भी उनकी बहुत इज्जत करते थे। इसी का फ़ायदा आगे चलकर जवाहरलाल नेहरू को भी हुआ। जब जवाहर नेहरू ने पार्टी जॉइन की थी, तो उनकी साख थोड़ी बहुत थी। लेकिन गाँधी जी से मिलने के बाद धीरे धीरे वो पार्टी के एक महत्वपूर्ण सदस्य बन गए थे।

जवाहरलाल नेहरू जी की महात्मा गाँधी से पहली मुलाकात 1916 में क्रिसमस के वक़्त लखनऊ में हुई थी। हालांकि वह गाँधी जी को पहले 1915 में देख चुके थे, लेकिन मुलाकात नही हुई थी।

वो गाँधी जी के रंगभेद के खिलाफ किये गए आंदोलन से बहुत प्रभावित थे और इससे भी ज्यादा प्रभावित थे गाँधी जी के मजबूत निश्चय से, जो देश को आजादी दिलाने का था।

दोबारा यूरोप प्रस्थान

बात 1922 की थी जब देश में चौरा चोरी हत्याकांड हुआ था। उस वक़्त मचे उपद्रव के कारण महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन बंद कर दिया था। उसी दौरान जवालाल लाल वापस यूरोप के स्वीटजरलैंड में गए। यहाँ जाने का उनका मुख्य उद्देश्य अपनी पत्नी का इलाज करवाना था, जो कि एक गंभीर बीमारी से जूझ रही थी।

हालांकि बीमारी के लिहाज से उन्हें कुछ खास फायदा तो नही हुआ, लेकिन यहाँ उन्हे विश्व राजनीति का केंद्र शहर जेनेवा बहुत अच्छा लगा। यहाँ पर उन्होंने विश्व राजनीति को समझा और विश्व राजनीति और भारत की राजनीति को किस तरह से आपस मे जोड़ा जा सकता है, इसकी समझ भी यही विकसित की।

इस टूर के बाद से जवाहरलाल नेहरू की सोच ज्यादा व्यापक हो गई थी। अब वो बाकी नेताओ से कुछ अलग सोचते थे। अपनी पत्नी के स्वास्थ्य में कोई विशेष सुधार न होता देख आखिर में उन्हें 1927 में अपने देश भारत परिवार के साथ आना पड़ा।

काँग्रेस में बढ़ता कद

दिनोदिन जवाहरलाल नेहरू का कद पार्टी में बढ़ता जा रहा था। उनके काम की प्रशंसा हो रही थी। इसलिए वह 1928 में पहली बार भारतीय युवा काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। इसके ठीक एक वर्ष बाद इन्हें काँग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। 31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में काँग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें पूर्ण स्वतंत्रता का आवाहन किया गया।

इसके बाद देश मे आजादी की एक अलग ही लहर चलने लगी। वही जवाहरलाल नेहरू इसके बाद एक प्रतिष्टित लीडर के तौर पर देश मे सामने आए।

आजादी की आखिरी जंग

पूरी दुनियाँ दूसरे विश्व युद्ध के दौर से गुजर रहा था। ऐसे में ब्रिटेन यह चाहता था कि भारत भी इस युद्ध मे शामिल हो। लेकिन जवाहरलाल नेहरू यह बात भली भांति जानते थे कि भारत को इस युद्ध मे शामिल होने से कोई लाभ नही होगा।

उन्होंने कहा की भारत एक ही शर्त में यह युद्ध लड़ सकता है, यदि ब्रिटेन यह समझौता करे कि पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को वह स्वीकार्य करेगा। ब्रिटेन को भारत की जरूरत थी इसलिए उसने भारत को यह मंजूरी दे दी कि संविधान बनाने के लिए वह सभा बुला सकता है।

लेकिन इसमें भी कुछ शरयंत्र था, जिसे जवाहरलाल नेहरु और बाकी नेता समझ गए। जिसके बाद भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। इस दौरान आंदोलन को थामने के लिए नेहरू समेत कई कांग्रेसी नेता को जेल में डाल दिया गया।

पहले प्रधानमंत्री का पद

देश की आजादी के बाद 1947 में पंडित जवाहरलाल नेहरू को देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया। देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने ही देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का सिद्धांत देश को दिया।

उन्ही के कार्यकाल में देश मे दंगे भी हुए, पाकिस्तान और चीन के साथ लड़ाई भी हुई। वह प्रधानमंत्री के पद पर 27 मई, 1964 तक बने रहे। 27 मई, 1964 को कुछ बीमारी के चलते पंडित जवाहरलाल नेहरू का देहांत हो गया था।


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तो यह था पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निबंध, आशा करता हूं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू पर हिंदी में लिखा निबंध (Hindi Essay On Pandit Jawaharlal Nehru) आपको पसंद आया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा है, तो इस लेख को सभी के साथ शेयर करे।

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