जंगल पर निबंध (Jungle Essay In Hindi)

आज के इस लेख में हम जंगल पर निबंध (Essay On Jungle In Hindi) लिखेंगे। जंगल पर लिखा यह निबंध बच्चो और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

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जंगल पर निबंध (Jungle Essay In Hindi)


प्रस्तावना 

जंगल पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों में से एक है। पेड़ो का विशाल पैमाने पर विस्तार ही वन कहलाता है। पौराणिक काल में ऋषि मुनि जंगलो में बैठकर तपस्या किया करते थे। पहले पृथ्वी के बहुत बड़े हिस्से में वन को गिना जाता था।

परन्तु दुर्भाग्यवश अब मनुष्य ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए वनो को बहुत पहले से ही काटना शुरू कर दिया है। वनो को सहज कर रखना बेहद आवश्यक है, क्योकि यह हमारी प्राकृतिक पूंजी है।

वन शब्द की उतपत्ति और विभिन्न परते  

वन शब्द की उत्पत्ति फ्रांसीसी शब्द से हुयी है, जिसका अर्थ है विशाल पैमाने पर पेड़ -पौधों का उपलब्ध होना। कुछ लोगो का यह कहना था की जंगल शब्द लैटिन शब्द फोरेस्ट से लिया गया है, जिसका तात्पर्य है ‘खुली लकड़ी’।

यह शब्द उस वक़्त का था जब राजा अपने शाही शिकार क्षेत्रों को सम्बोधित करने के लिए उपयोग करते थे। जंगल का निर्माण विभिन्न परतो द्वारा होता है। यह सारी परतें वन को पकड़ कर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। यह परतें कुछ इस प्रकार है, वन की जमीन, अंडर स्टोरी, कैनोपी और एमजेन्ट परत।

वनो के प्रकार

वनो के कई प्रकार है जैसे उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन, उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन, पर्वतीय वन और अनूप वन। सदाबहार वन उत्तर पूर्वी क्षेत्र और अंदमान द्वीप समूह में पाया जाता है।

ऐसे वनो में रोजवुड, महोगनी, ऐनी, फ़र्न जैसे प्रजातियां पाए जाते है। अर्ध सदाबहार वन में साइडर, होलक, कैल जैसे वृक्ष पाए जाते है। उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन को मानसूनी वन भी कहा जाता है, क्यों कि इसी मौसम में यह वन हरे- भरे हो जाते है।

इन वनो को आद्र और शुष्क वनो में विभाजित किया गया है। आद्र पर्णपाती वन उत्तर पूर्वी राज्यों, हिमालय की तलहटी और ओडिसा जैसे क्षेत्रों में पाए जाते है। इन वनो में साल, सागौन, शीशम, सेमल, कुसुम और चंदन जैसे बहुमूल्य वृक्ष पाए जाते है।

शुष्क पर्णपाती वन उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाको में पाए जाते है। इसमें तेन्दु, पलास, अमलतास, बेल जैसे मुख्य वृक्ष पाए जाते है। उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन पंजाब, हरियाणा, गुजरात और मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पाए जाते है। ऐसे वनो में बबूल, बेर, कांटेदार झाड़ियाँ, नीम, पलास जैसे वनस्पति उपलब्ध है।

पर्वतीय वनो में पहाड़ो की ऊंचाई वृद्धि होने के साथ उसकी वनस्पतियां भी अलग -अलग प्रकार की होती है। उत्तर पर्वतीय वन में जुनिपर, पाईन, बर्च जैसे वृक्ष पाए जाते है। दक्षिणी पर्वतीय वन पश्चिमी घात और नीलगिरी की पहाड़ियों में पाए जाते है।

अनूप वन को मैंग्रोव वन भी कहा जाता है। ऐसे वनो में सुन्दर वन डेल्टा, अंदमान निकोबार दिप समूह और डेल्टाई भागो में पाए जाते है। भारत के कई राज्य जैसे अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिसा, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र है। जहां देश की सबसे अधिक वन भूमि पायी जाती है।

भारत में कई राष्ट्रिय उद्यान यानी नेशनल पार्क और अभारण्य है, जहाँ कई हेक्टार्स में वनभूमि फैली हुयी है। अक्सर पर्यटक यहां घूमने आते है। जीव -जंतुओं की सुरक्षा के लिए यहां कई दिशा -निर्देश पालन किये जाते है।

कई जगहों से लोग यहां वनो का आनंद लेने की लिए आते है। सुन्दर बन, गिर, जिम कॉर्बेट, रणथम्बोर, काज़ीरंगा नेशनल पार्क, मानस नेशनल पार्क इत्यादि वन भूमि क्षेत्र के उदाहरण है।

जंगल का महत्व

वनो पर सभी का अधिकार है। पशु पक्षी और विभिन्न प्रकार के जीव जंतुओं का प्राकृतिक आवास है जंगल। घने जंगलो में विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी और पेड़ पाए जाते है। वनो के बगैर मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। वनो से हमे कई अनगिनत लाभ मिलते है। पृथ्वी की सुंदरता वनो से ही बनती है।

वृक्ष गर्मी में हमे छाया प्रदान करते है। सबसे अधिक वृक्ष हमे वनो में मिलते है। वनो में पशु –पक्षी सुरक्षित महसूस करते है। जंगल में अलग -अलग  तरह के जानवर पाए जाते है। शेर, चीता, तेंदुआ, लोमड़ी, भेड़िया जो मांसहारी है।

हाथी, हिरण, खरगोश इत्यादि जानवर भी पाए जाते है जो शाकाहारी भोजन करते है। वृक्षों पर घोंसले बनाकर सुन्दर पक्षियां भी यहां निवास करती है। तोता, उल्लू , गिद्ध इत्यादि कई प्रजातियों की पक्षियाँ वनो में पाए जाते है।

जंगलो में मांसाहारी जानवर, शाकाहारी जानवरो का शिकार करते है। शाकाहारी जानवर हरी घास और पेड़ो के पत्तो को खाकर अपना गुजारा करते है। जंगल से कई नदियाँ बहती है।लम्बे वृक्ष इन नदियों पर छाया प्रदान करते है।

इसलिए तेज़ धूप के कारण नदियाँ सूखती नहीं है। पौधे और वृक्ष, मनुष्य और जीव- जंतुओं को ऑक्सीजन प्रदान करते है। हम कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते है जिसका उपयोग करके पौधे और पेड़ फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया करते है।

इस प्रक्रिया से पेड़-पौधों को अपना भोजन प्राप्त होता है। फोटोसिंथेसिस को हिंदी में प्रकाश संश्लेषण कहते है। इस प्रक्रिया के लिए पानी, सूरज की किरणे और कार्बन डाइऑक्साइड की आवश्यकता होती है। अगर हम पृथ्वी पर सांस ले पाते है तो उसका श्रेय पेड़ -पौधों को जाता है।

धरती पर वनो का होना अत्यंत ज़रूरी है। अगर पेड़ होंगे तभी वन होंगे और वन होंगे तो वर्षा ज़रूर होगी। वनो के निरंतर कटने से वर्षा में कमी आयी है। वनो के कारण, वातावरण में आद्रता रहती है जिसे अंग्रेजी में ट्रांस्पिरेशन कहा जाता है।

पेड़ जलीय वाष्प छोड़ता है, जिसके कारण यह बूंदे वर्षा करवाने में मदद करती है। जंगल जीव जंतुओं के रहने की जगह है। वनो में विभिन्न प्रकार के औषधि वाले पेड़ पाए जाते है। कई बीमारियों के लिए औषधि, तरुओं की छाल से बनाये जाते है। वृक् प्रकृति में निश्चित संतुलन बनाये रखता है।

संसार के हज़ारो उद्योग सम्पूर्ण रूप से वनो पर निर्भर है। विभिन्न प्रकार के वस्तु जैसे लकड़ी इत्यादि कच्चे सामाग्री ऐसे उद्योगों को वनो से ही प्राप्त होते है। पेड़ -पौधों से हमे फल मिलते है जो हमारे शरीर के लिए लाभदायक है।

पेड़ो -पौधों से हमे फूल मिलते है। पीपल और तुलसी जैसे पेड़ -पौधों को पूजा जाता है। नीम, तुलसी, आमला जैसे प्राकृतिक औषधि हमारे शरीर संबंधित कई बीमारियों को ठीक करने में सक्षम है।

वनो में कई तरह के वृक्ष जैसे चीड़, सागौन, देवदार इत्यादि से फर्नीचर बनाये जाते है। लेकिन इस तरीके से अगर कटाई होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब यह हरियाली सम्पूर्ण तरीके से मरुस्थल में परिवर्तित हो जायेगी। संसार के लाखो लोग अपनी आजीविका के लिए सम्पूर्ण रूप से वनो पर निर्भर है। वनो के संरक्षण के लिए लगभग दस मिलियन लोग कार्यरत है।

वनो का संरक्षण है आवश्यक

जंगल की सुरक्षा मनुष्य और प्रत्येक जीव जंतुओं के लिए ज़रूरी है। वनो में वृक्ष की जड़े मिटटी के कणो को पकड़ कर रखती है, जिसके कारण भूमि कटाव नहीं होती है। बाढ़ के समय वृक्ष की जड़े भूमि कटाव को रोकने में मददगार साबित हुयी है।

कागज़ बनाने के लिए बम्बू के पेड़ो को काटा जाता है। अब वक़्त आ गया है कि मनुष्य कागज़ का सोच समझ कर इस्तेमाल करे। पर्यावरण में दैनिक हर प्रकार के प्रदूषण को रोकने में वन एक अहम भूमिका निभाते है।

वनो की अत्यधिक कटाई से दुष्प्रभाव

पहले के ज़माने में लोगो ने कई जानवरो के शिकार किये, जिसके कारण आज यह आलम है कि कई प्रजातियां जैसे विलुप्त हो गयी है। अत्यधिक शिकार के कारण कुछ जानवर विलुप्त होने की कगार पर खड़े है।

अगर वन नहीं होंगे तो पृथ्वी से हरियाली ख़त्म हो जायेगी | मनुष्य अपनी उन्नति की राह पर इतना अँधा हो गया है, कि उसने वनो को असीमित रूप से काटना शुरू कर दिया है। वनो के काटने की प्रक्रिया को अंग्रेजी में डेफोरेस्टशन कहा जाता है।

जिसे हिंदी में वनोन्मूलन कहा जाता है। मनुष्य जाति ने बड़े -बड़े शहरों को विकसित करने के लिए वनो को काटकर बड़ी -बड़ी इमारते, चौड़ी सड़को और फैक्टरियों का निर्माण करवाया। बड़े -बड़े कारखाने बनवाने के लिए वृक्षों की कटाई की गयी। वनो को काटने का सबसे प्रमुख कारण है जनसँख्या वृद्धि।

जितनी अधिक जनसँख्या होगी, उतने ही घरो की आवश्यकता होगी, जिसके कारण वनो को काटा जाएगा। यह अनुचित कार्य जिसे मनुष्य जान कर भी वर्षो से कर रहा है। वनो में  बिना इज़ाज़त के पेड़ो को काटना और जानवरो का शिकार करना गैर कानूनी है।

यह सारी गतिविधियां गैर कानूनी है, जिसके लिए सज़ा मिलती है। वनो को इस प्रकार से काटने से सबसे अधिक पशु -पक्षी प्रभावित होते है। अगर वन नहीं होंगे तब वे कहाँ जाएंगे। पेड़ो की अंधाधुंध कटाई से पृथ्वी पर प्रदूषण अपने चरम सीमा तक पहुँच गया है।

कारखानों से निकलने वाले दूषित गैस को वृक्ष कम करते है। वृक्ष सारे जेहरीले गैस को सोख लेता है और पर्यावरण को दूषित होने से बचाता है। लगातार पेड़ो को काटने से मिटटी की उर्वरता पर असर पड़ता है।

पेड़ो की पत्तियां और पेड़ो से गिरने वाले सूखे डाल, मिटटी की उर्वरता को विकसित करते है। अगर वृक्ष नहीं होंगे तो मिटटी की उपजाऊ शक्ति खत्म हो जायेगी। पृथ्वी पर दिन प्रतिदिन ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएँ नियमित रूप से बढ़ रही है।

इस पर अंकुश लगाना बेहद आवश्यक है। यह अंकुश तभी लगेगा जब वनो की कटाई को रोका जाए। ग्लोबल वार्मिंग को हिंदी में भूमंडलीय ऊष्मीकरण कहा जाता है। जब पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसे गैस वातावरण में अत्यधिक उत्पन्न हो जाते है, तब उसे ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है।

इससे पृथ्वी की तापमान ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाता है, जिसकी वजह से कई प्रकार की भयानक समस्याएँ उत्पन्न होती है। सूरज की रोशनी पृथ्वी के लिए आवश्यक है, लेकिन सूरज से निकल रही अत्यधिक रेडिएशन्स जब धरती से बाहर नहीं निकल पाती है तब ग्लोबल वार्मिंग की समस्या उतपन्न होती है।

निरंतर बढ़ता हुआ वायू प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाता है। ग्लोबल वार्मिंग से इतनी अधिक गर्मी बढ़ रही है कि, अंटार्टिक पर जमी बर्फ पिघल रही है और समुद्र में जल स्तर बढ़ रहा है।

बड़े – बड़े ग्लेसियर पिघलने की वजह से जल में बढ़ोतरी हो रही है। जिसके कारण सारे तटीय क्षेत्र डूब जाने की कगार पर खड़े हो गए है। अगर वृक्ष ना काटे जाए, तो ग्लोबल वार्मिंग को कम किया जा सकता है। जंगल पृथ्वी के वायुमंडल में सम्पूर्ण संतुलन बनाये रखता है।

वनो की कटाई को रोकने के लिए ज़रूरी  उपाय

वृक्षों की अत्यधिक कटाई को रोकने के लिए लोगो को जागरूक करने की आवश्यकता है। बहुत पहले से लोगो को पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित कर, हर पैमाने पर पुरज़ोर कोशिश की जा रही है।

पेड़ो को लगाने की प्रक्रिया को वृक्षारोपण कहा जाता है। वृक्षारोपण को अंग्रेजी में अफ्फोरेस्टशन कहा जाता है। वन महोत्सव जुलाई के प्रथम हफ्ते में मनाया जाता है। इसके माध्यम से लोगो में पेड़ लगाने की भावना को विकसित किया जाता है। विद्यालय के छात्र भी इसमें भाग लेते है।

लोगो में यह जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है कि बिना ठोस कारण के कोई भी व्यक्ति पेड़ नहीं काट सकता है। अगर फिर भी पेड़ काटना पड़े, तो व्यक्ति को दो पौधे लगाने की आवश्यकता है।

जितना पेड़ हम लगाएंगे, उतना ही हम प्रकृति और पर्यावरण को नष्ट होने से बचा सकते है। हरी -भरी और खुशहाल प्रकृति का निर्माण वृक्षों पर निर्भर करता है। मनुष्य को पेड़ लगाकर पुण्य कमाना चाहिए। पेड़ो के बैगर हम जिन्दगी की कल्पना नहीं कर सकते है। वनो की कटाई पर रोक लगाना अत्यंत आवश्यक है।

निष्कर्ष

भारत सरकार और वन विभाग ने वनो के संरक्षण के लिए कई नियम बनाये है। लेकिन यह हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम वनो के संरक्षण के तरफ अपनी जिम्मेदारी भी निभाए। छात्र जीवन से ही वृक्षारोपण के महत्व को समझाना चाहिए।

छात्रों को पेड़ -पौधे लगाने के  प्रति समय -समय पर प्रोत्साहित करना चाहिए। जंगल सिर्फ मनुष्य जाति के लिए ही नहीं बल्कि समस्त जीव जंतुओं की लिए भी ज़रूरी है।

पेड़ो का निरंतर कटाव मनुष्य जाति और प्रकृति की लिए भीषण गंभीर समस्या है। प्रकृति में संतुलन और समस्त जीव जंतुओं की सुरक्षा के लिए हमे एक जुट होना होगा। पृथ्वी पर हरियाली को जीवित रखने के लिए वृक्षारोपण निरंतर रूप से करने की ज़रूरत है।


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तो यह था जंगल पर निबंध, आशा करता हूं कि जंगल पर हिंदी में लिखा निबंध (Hindi Essay On Jungle) आपको पसंद आया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा है, तो इस लेख को सभी के साथ शेयर करे।

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