पर्यावरण पर निबंध (Environment Essay In Hindi)

आज के इस लेख में हम पर्यावरण पर निबंध (Essay On Environment In Hindi) लिखेंगे। पर्यावरण पर लिखा यह निबंध बच्चो और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

पर्यावरण पर लिखा हुआ यह निबंध (Essay On Environment In Hindi) आप अपने स्कूल या फिर कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल कर सकते है। आपको हमारे इस वेबसाइट पर और भी कही विषयो पर हिंदी में निबंध मिलेंगे, जिन्हे आप पढ़ सकते है।


पर्यावरण पर निबंध (Environment Essay In Hindi)


प्रस्तावना

वैसे तो मनुष्य ने अपने विवेक-बल से अपने जीवन को दिनों- दिन सुखमय ओर कल्याणमय बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की उपलब्धिया अर्जित कर ली है। परन्तु इस दिशा में वह आगे बढ़ते हुए उनसे यह भूल हो गयी कि उसने इन सुखद संसाधनों और स्वरूपो के कारण कुछ हानिप्रद यहाँ तक जीवन -घातक रूपों -प्रतिरूपों को जन्म दे दिया है।

इस प्रकार मनुष्य द्वारा लाये गए विज्ञान की देनो ने प्रकृति का इतना शोषण और दोहन करना शुरू किया है, कि इसके प्रतिक्रिया स्वरूप पर्यावरण-प्रदूषण जैसी एक गम्भीर समस्या उसके सामने खड़ी हो कर उसके विकास को धत्ता बतलाने लगी है।

सामान्य अर्थो में पर्यावरण

पर्यावरण वह सभी जैविक ओर अजैविक अवयवों का समिश्रण है। जो पृथ्वी और उसपे रहने वाले जैविक तत्वों को घेरे हुए है। भौतिक संघटकों के अंतर्गत स्थल, वायु, ओर जल सम्मिलित है। जैवमण्डल पृथ्वी, जल तथा वायु मंडल का भाग है, जिसके भीतर छोटे-छोटे पारिश्रमिक कार्य करते है। जैवमण्डल के तीन घटक है, स्थल मंडल, जल मंडल ओर वायु मंडल।

प्रदूषण वायु, जल, भूमि अर्थात पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में होने वाले ऐसे अनचाहे परिवर्तन है, जो मनुष्य एवं अन्य जीवधारियों को उनके जीवन परिस्थिति ओधोगिक प्रक्रियाओं एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिए हानिकारक है और उसे ही प्रदूषण कहते है।

अनिम्नियकरन प्रदूषण जैसे अल्लुमिनियम के बर्तन, पारे के यौगिक, डीडीटी, कांच,आसेनिक तथा प्लास्टिक सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटित नहीं होते। जबकि जैव, निम्नकर्णीय प्रदूषण जैसे, घरेलू वाहित, मल, कागज, कूड़ा करकट आदि सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटित कर दिया जाते है।

प्रदूषण मुख्यतः निम्न प्रकार के होते है। वायु प्रदूषण, जीन अवांछनीय तत्वों से वायु प्रदूषित होती उन्हें वायु प्रदूषण कहते है। बड़े शहर में 60% वायु प्रदूषण कार, ट्रक, स्कुटर, आदि स्वचालित वाहनों में आन्तरिक दहन ईंजन के कारण होता है।

वायु प्रदूषण का अर्थ वायु और प्रदूषण दो शब्दों से मिलकर बना है। वायु जो शुद्ध वायु है जो प्रदूषण के द्वारा दूषित हो जाती है। वायु पूरी पृथ्वी में व्याप्त है। वायु का पर्यायवाची शब्द भी है, हवा, पवन, समीर आदि वायु मिश्रण है।

पर्यावरण क्या होता है?

सबसे पहले पर्यावरण क्या होता है। पर्यावरण वायु ,जल या भूमि है, अर्थात यही पर्यावरण का रूप है इसे ही पर्यावरण कहते है। और पर्यावरण में ही भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणों में होने वाले ऐसे अनचाहे परिवर्तन, जो मनुष्य एवं अन्य जीवधारियों उनकी जीवन परिस्थितियों, ओधोगिक प्रिकिया एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिए हानिकारक हो उसे प्रदूषण कहते है। जो कि पर्यावरण के निहित रहता है ओर ये पर्यावरण में दो प्रकार में पाया जाता है।

(1) गैर-बायोडिग्रेडेबल प्रदूषण (Non-Biodegradable pollutants)

जैसे एल्युमिनियम के बर्तन, पारे के योगिक, डी डी टी, कांच तथा प्लास्टिक सुक्ष्म जीवो द्वारा अपघटित नही होते है।

(2) बायोडिग्रेडेबल प्रदूषण (Biodegradable pollutants)

कूड़ा, करकट, घरेलू वाहित, मल, कपड़ा, कागज आदि।

पर्यावरण की परिभाषा

पर्यावरण शब्द की उत्तपति फ्रांसीसी शब्द” एनिट्स” से हुई है। पर्यावरण शब्द का निर्माण दो शब्दों परी ओर आवरण से मिलकर बना है। जिसमे परी का मतलब है हमारे आसपास अर्थात जो हमारे चारों ओर है और आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है।

पर्यावरण उन सभी भौतिक रासायनिक एवं जैविक कारकों की कुल इकाई है। जो किसी जीवधारी अथवा परितन्त्रीय आबादी को प्रभावित करते है। तथा उनके रूप जीवन और जीविता को तय करते है।

पर्यावरण किन से मिलकर बना है?

हम अगर पुस्तक की भाषा मे कहेंगे तो पर्यावरण एक संघटक से मिलकर बना है। संघटक मतलब कीसी भी चीज़ो से मिलकर बनना, जैसे पर्यावरण जो कई प्रकार के संघटक से मिलकर बना है।

पर्यावरण वह सभी जैविक (Biotie )तथा अजैविक (Abiotie) अवयवों का समिश्रण है, जो पृथ्वी और उस पर रहने वाले जैविक तत्वों को घेरे हुए है। पर्यावरण के संघटक मुख्यतः तीन प्रकार के होते है जो है भौतिक, जैविक ओर ऊर्जा संघटक।

भौतिक संघटको के अंतर्गत स्थल, वायु एवं जल शामिल है, जैविक संघटकों में जीवित प्राणी एवं पादप सम्मिलित है। एवं ऊर्जा संघटकों में मुख्यतः सौर ऊर्जा और भूतापीय ऊर्जा शामिल है।

जैवमण्डल पृथ्वी, जल तथा वायुमंडल का वह भाग है, जिसके अंदर छोटे-छोटे पारितन्त्र कार्य करते है। जैवमण्डल के तीन घटक है जो है स्थलमण्डल, जलमंडल, वायुमंडल।

Ecology (परिस्थितिकी) पर्यावरण

पर्यावरण और जीव के आपस मे रहने को ecology या परिस्थितिकी कहा जाता है, जो कि पर्यावरण में जरूरी है। और परिस्थितिकी या Ecology शब्द का सबसे पहली बार प्रयोग अर्नेस्ट हैकेल ने 1869 में किया था।

तो आप समझ ही गए होंगे कि पर्यावरण पर रीसर्च पर्यावरण की जानकारी हमे 18वी शताब्दी से ही दी जा रही है। हम मनुष्य जानते सब है फिर भी वो गलतियां करते है जो हमारे लिए ही नुकसानदायक सिद्ध होती है।

पर्यावरण परिस्थितिकी (Ecology) क्या है?

इसका सर्वप्रथम प्रयोग ए. जी. टांसले ने वर्ष व 1935 में किया था। किसी क्षेत्र के भौतिक पर्यावरण तथा उसमें रहने वाले जीवों के बीच पारस्परिक अन्तर्सम्बन्ध परिस्थितिक तंत्र (ECO SYSTEM) कहलाती है।

परिस्थितिक तंत्र के मुख्यतः दो घटक होते है, जैविक तथा अजैविक। जैविक घटक के अंतर्गत उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक (DECOMPOSER) शामिल है। जबकि अजैविक घटक के अंतर्गत प्रकाश, वर्षा, तापमान जैसे भौतिक कारक शामिल है।

पर्यवरण के स्वरूप

पर्यावरण में व्याप्त ओर फैलते हुए प्रदूषण के रूप एक नही अनेक है। अमेरिकी राष्टीय विज्ञान अकादमी का मानना है कि भूमि, जल ओर वायु के भौतिक, रसायनिक ओर जैविक गुणों से होने वाला कोई भी अवांछनीय परिवर्तन ही प्रदूषण है।

यह प्रदूषण हमारे जीव-जंतु , उद्योग, संस्कृति ओर प्रकृति को बड़ी हानि पहुँचाता है। निरन्तर बढ़ती जनसंख्या ओर वस्तुओं का प्रयोग करने के पश्चात फेंक देने की प्रकृति ने पर्यावरण-प्रदूषण को ओर भी अधिक विकरालता प्रदान की है। पर्यावरण -प्रदूषण के रूप एक नही अपितु अनेक है। जिन पर प्रकाश डालना विषयानुकूल ओर प्रासंगिक होंगी।

पर्यावरण में व्याप्त इन प्रदूषण पर प्रकाश

(1) भूमि प्रदुषण

(2) जल प्रदूषण

(3) वायु प्रदूषण

(4) कोविड 19 वायु में

(5) ध्वनि प्रदूषण

पर्यावरण में व्याप्त भूमि प्रदुषण

भूमि प्रदूषण हमारे जीवन को सबसे पहले दुष्प्रभावित करने वाला एक प्रमुख ओर शक्तिशाली प्रदूषण है।आज हमारे पर्यावरण में भूमि प्रदूषण के मुख्य कारण है बांध ओर रासायनिक उर्वरको का अधिक से अधिक मात्रा में प्रयोग।

हम अब यह भली भाँति जानते है कि बांध भूमि अपक्षय करते है। यह भी हम जानते है कि उर्वरकों का प्रयोग अंततः भूमि के उपजाऊ तत्वों में कमी करता है। उर्वरको का प्रयोग करते समय हम बिल्कुल यह भूल जाते है कि भूमि की उर्वरक शक्ति एक निश्चित ओर एक सीमा तक ही रहती है।

फिर भी हम यह जानकर भी उर्वरको की सहायता से भूमि की उर्वरा शक्ति और क्षमता का अधीकाधिक दोहन करते ही रहते हैं। इसी प्रयास में हम प्रदूषण के कारक कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करना नहीं छोड़ते है।

पर्यावरण में जल-प्रदूषण

विज्ञान को हाथो में लेकर आज मनुष्य ने अदभुत ओर बेजोड़ शक्तिपूर्ण उधोग-धंधों को शुरू कर दिया है। अंधाधुंध मशीनीकरण इसका ही परिणाम है। इससे प्रदूषण नामक कुपरिणाम सामने आने लगा है।

मिलो, फैक्ट्रियों ओर दूसरे उधोग धंधो से निकलने वाला कचरा नालों ओर नलियों से बह-बहकर नदियों और जलाशयों के जल को प्रदूषित करने में जरा भी नही ठहरता। यही कारण है कि गंगा-यमुना जैसी विशाल नदियोँ दिनों-दिन प्रदूषण की चपेट में आने के कारण अपनी पवित्रता व शुद्धता को बरकरार रखने में असमर्थ हो रही है।

जल-प्रदूषण को बढाने में रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग कम नहीं है। यह हम भलीभाँति जानते है कि जल-प्रदूषण के कारण प्रदूषित जल-पान से लगभग 70 प्रतिशत बीमारिया उत्पन्न होती है। इनमें से अदिकांश बीमारियां तो बिल्कुल ही असाध्य होती है।

पर्यावरण में वायु प्रदूषण

सच्चाई यह है कि वायु-प्रदुषण सबसे बड़ा और कुप्रभावशाली प्रदूषण है। इसका प्रभाव सबसे पहले ओर सबसे अधिक समय तक पड़ता है। भूमि-प्रदूषण और जल प्रदूषण दोनों ही वायु में निरन्तर फैलते रहते है। फलतः शुद्ध और ताजी वायु का मिलना असम्भव नहीँ, तो कठिन अवश्य हो जाता है।

वायु प्रदूषण का एक कारण जनसँख्या का अत्यंत तेजी से बढ़ना भी है। एक अनुसंधान के अनुसार लगभग कार्बनडाइआक्साइड पांच अरब टन प्रतिशत दर से बढ़ रही है। मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षी ओर अन्य प्राणी भी वायु -प्रदूषण के कारण शुद्ध वायु के लिए छटपटा रहे है।

वैज्ञानिक की यह खोज है कि वायु -प्रदूषण से समुद्रतटीय -क्षेत्र दुष्प्रभावित होने लगे है। अंटआक्राटीका जैसे शांत क्षेत्र भी अब तुफानो की गिरफ्त में आ गया है। सी. एफ. सी. गैस का बढ़ना जारी है और इसके ही दुष्प्रभाव से आज ओज़ोन की परत पतली होती जा रही है।

इसके कारण पराबैगनी किरणे सीधे धरती पर आती है। जो अंतः कैंसर आदि भयानक बीमारियों का कारण बनती जा रही है।

वायु प्रदूषण का मुख्य कारण ओधोगिक इकाईया है। वहीं परमाणु ऊर्जा पर आधारित बिजलीघर ओर कारखाने भी है। इनसे वायु मंडल में रेडियोधर्मी लहरें दुष्प्रभावित होती है। इनसे बाहर निकलने वाली गैस वायुमंडल को प्रदूषित करती रहती है।

इसके साथ-साथ वायु-प्रदूषण का भयानक चाप तो परमाणु -परीक्षण विस्फोट, परमाणु -शक्ति संचालित, अंतरिक्ष अभियान भी प्रमुख कारण है। इनसे वायुमंडल अब अधिक प्रदूषित होकर आंदोलित होने लगा है।

पर्यावरण में कोरोना वायरस का प्रभाव

कोरोना वायरस महामारी तेजी से अपने पैर पसार रही है। हर रोज पूरी दुनिया मे संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे है। इसी बीच वैज्ञानिक के दिए गए सबूतों के आधार पर WHO ने यह स्वीकारा था कि हवा के जरिये भी कोरोना वायरस फैल सकता है ओर हमारे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचा रहा है। इस विषय मे who ने नई गाइडलाइंस जारी की है।

ओर वो ये है कि कोरोना वायरस का संक्रमण हवा के जरिये भी फैलता है।और इस बारे में लगभग 32 देशों के वैज्ञानिको ने दावा भी किया है, जिसके बाद WHO ने कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के माध्यम में हवा को भी शामिल किया है।

इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अब नई गाइडलाइंस जारी की है। इसमें कुछ ऐसी मरमुख बाते भी बताई गई है, जिनके बारे में लोगों को जरूर जानना चाहिए ताकि हवा के जरिये फैलने वाले कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के लिए जरूरी कदम समय पर उठाया जा सके।

पर्यावरण में ध्वनी प्रदूषण

ध्वनि प्रदूषण से हमें कई प्रकार की समस्या होती है। आज के आधुनिक युग मे मोटर गाड़ियों, स्वचालित वाहनों, लाउडस्पीकर, कल कारखाने एवं मशीनों का उपयोग काफी अधिक होने लगा है। जिनसे निकलने वाली आवाज हमें परेशान करने के साथ-साथ हमारे स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालती है, जिसे ध्वनि प्रदूषण कहते है।

मनुष्य की श्रवण क्षमता 80 डेसिबल होती है। इससे ज्यादा की आवाज मनुष्य बर्दास्त नहीं कर सकता है। 0 से 25 डेसिबल पर शांति तक कि आवाज से शांति का वातावरण रहता है। आवाज की तीव्रता 80 डेसिबल से अधिक होने पर मनुष्य बीमार होने लगता है और उसे तकलीफ महसूस होने लगती है।

वही जब आवाज की तीव्रता 130 – 140 डेसिबल हो जाती है तो व्यक्ति को बेचैनी होने लगती है। लगातार इस तीव्रता की आवाज के बीच रहने पर व्यक्ति बहरा भी हो सकता है।

पर्यावरण में ध्वनी प्रदूषण के प्रभाव

ध्वनि प्रदूषण हमे कई प्रकार से प्रभावित करते है। अधिक ध्वनि के कारण सिरदर्द, थकान, अनिद्रा, श्रवण क्षमताओं में कमजोरी, चिड़चिडॉपन, उतेजना, आक्रोश आदि बीमारियां हो सकती है।

ध्वनि प्रदूषण के कारण मेटाबॉलिक (उपापचयी) प्रक्रियाए प्रभावित होती है। एड्रिनलहार्मोंन का स्त्राव भी बढ़ जाता हैं, जिससे धमनियों में कोलेस्ट्रोल का जमाव होने लगता है। इससे जनन क्षमता कम हो जाती है।

अत्याधिक तेज ध्वनि से मकानों की दीवारों में दरार आने की संभावना भी बढ़ जाती है। कुछ लोगो को कसके बात करने की आदत होती है, परन्तु यह बहुत ही गलत है जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है।

पर्यावरण का आवांछनीय तत्वों से मिलकर बनना

(1) जिन अवांछनीय तत्वों से वायु प्रदूषित होती है उन्हें वायु प्रदूषक कहते है। बड़े शहरों में 60% वायु प्रदूषण कार, ट्रक, स्कूटर, आदि स्वचालित वाहनों (Automobiles) में आंतरिक दहन इंजन के कारण होता है।

(2) इंजनों से उत्पन्न मुख्य प्रदूषक कार्बन मोनोऑक्साइड (77.2%), नाइट्रोजन आक्साइड (7.7%) तथा हाइड्रोकार्बन (13.7%) है।

(3) सल्फ्यूरिक अम्ल व नाइट्रिक अम्ल बूंदों के रूप में पर्यावरण में पृथ्वी पर पहुचते है। इसे अम्ल बर्षा (Acid rain) कहते है। कुछ लाइकेन जैसे यूसनिया SO२ प्रदुषण के सूचक होते है।

(4) वायुमंडल में ओज़ोन की परत हानिकारक पराबैगनी किरणों को पृथ्वी पर पहुचने से रोकती है। क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFCs) के कारण ओज़ोन की परत नष्ट हो रही है और इसे ओजोन छिद्र (ozone hole) कहते है।

(5) CO२ की अधिक सान्द्रता के कारण वायुमण्डल में एक मोटा आवरण बन जाता है। जो पृथ्वी से वापस लौटने वाली किरणों को रोकता है। इससे पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगता है और इसे हरित ग्रह प्रभाव (green house effect) कहते है। कार्बनडाइआक्साइड (CO२), नाइट्रस आक्ससीड (N२O), मीथेन (CH4), जलवाष्प आदि प्रमुख हरित गृह गैसे है।

(6) क्योटो प्रोटोकाल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण करता है।

(7) मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल ओज़ोन परत को बचाने से सम्बंधित है।

(8) वायु प्रदुषण से मनुष्य में दमा, ब्रांकाइटिस, आँखों मे जलन, बच्चों में साँस की तकलीफ, फेफड़ों के कैंसर आदि बीमारियां होती है।

इस प्रकार हम देख सकते है कि कई ऐसी चीजें है जो मानव के स्वास्थ के लिए अति आवश्यक है। जो कि पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप में ही मौजूद है। परंतु हम मानव ही इसे प्रदूषित करके हमारे लिए स्वयं एक हानिकारक परिस्थिति पर्यावरण में फैला रहे है।

कोरोना जैसी बीमारी भी एक केवल सर्दी, खासी से हो जाती है। अगर हमने हमारे वातावरण और पर्यावरण को स्वच्छ रखा होता तो, आज हमें इतना भयंकर परिणाम पर्यावरण को प्रदूषित करके नहीँ देखना पड़ता।

जहां वायु में स्वच्छ ऑक्सीजन हमारे लिए आवश्यक है। वही कोरोना का कीटाणु हवा में घुल कर हमें नुकसान पोहचा रहा है। इसलिए हमें अब बस हमारे पर्यावरण को ही स्वछ ओर साफ रखना होंगा ताकि हम स्वस्थ रह सके और इतिहास में ये दाग ना लगे कि हम हमारे पर्यावरण को ही नहीं बचा सके, तो स्वयं को क्या बचा पायेंगे।

पर्यावरण में प्रदूषण को रोकने के उपाय

पर्यावरण में पदूषण के विकराल कलमुखी दुष्प्रभाव को रोकने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि प्रदूषण के कारणों का ही गलाघोंट दिया जाए। दूसरे शब्दों में भूमि – प्रदूषण को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि बांधो का लगातार निर्माण, बेशुमार वन-कटाव ओर रासायनिक उर्वरकों का सीमित ओर अपेक्षित प्रयोग हो।

जल- प्रदुषण की रोक-थाम के लिए आवश्यक है कि उधोग के प्रदूषित जल को स्वच्छ जल से बचाए। वायु-प्रदूषण की रोक तभी सम्भव है जब उधोग -धंधो कुदूषित वायु को वायुमण्डल में फैलने न दे।

इसके लिए उधोगो की चिमनिया पर उपयुक्त फिल्टरों को लगाना चाहिए। इसके अतिरिक्त परमाणु -ऊर्जा से उतपन्न होने वाले वायु- प्रदूषण को रोकने के लिए अंतर्राष्टीय ऊर्जा-संघ के नियमो का सख्ती से पालन किया जाए। पर्यावरण -प्रदूषण की रोक जनसंख्या – बृद्धि पर अंकुश लगा कर ही कि जा सकती है और पर्यावरण को स्वच्छ रखकर कोरोना जैसी बीमारी से भी निपटा जा सकता है।

पर्यावरण दिवस

हमारे देश में क्या पूरी पृथ्वी के लिए ही पर्यावरण को स्वच्छ और साफ रखना अतिआवश्यक हो गया है। इसी को दृष्टि में रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने पूरे विश्व में राजनीतिक और सामाजिक जाग्रति लाने के लिए 1972 में पर्यावरण दिवस मनाने की घोषणा की थी।

इसे 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद शुरू किया गया था। 5 जून 1974 को पहला पर्यावरण दिवस मनाया गया था। हमारे भारत देश मे तो पर्यावरण दिवस को बहुत ही अच्छे से मनाने की परंपरा बनती जा रही है।

उपसंहार

पर्यावरण हमारे लिए ओर हमारे आस पास के वातावरण को हमारे रहने के अनुकूल बनाता है। इसलिए हमे भी इसकी पूरी तरह से देखभाल करनी चाहिए। पर्यावरण को साफ और  स्वच्छ रखने के लिए भरकस प्रयास करना चाहिए।

इसमे प्रदूषण जैसे प्राणघातक सृष्टि ओर प्रकृति को बचाना चाहिए, इसलिय समय रहते गम्भीर नहीँ हुए तो ये कुछ समय बाद हमारे बश में नही रहेंगा और फिर ये हमारे कठिन से कठिन प्रयासों को ठेंगा दिखाते हुए हमारी जीवन लीला को कोरोना जैसी बीमारी की तरह समाप्त कर देगा।


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तो यह था पर्यावरण पर निबंध, आशा करता हूं कि पर्यावरण पर हिंदी में लिखा निबंध (Hindi Essay On Environment) आपको पसंद आया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा है, तो इस लेख को सभी के साथ शेयर करे।

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