सूखा पर निबंध (Drought Essay In Hindi)

आज हम सूखा पर निबंध (Essay On Drought In Hindi) लिखेंगे। सूखा पर लिखा यह निबंध बच्चो (kids) और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

सूखा पर लिखा हुआ यह निबंध (Essay On Drought In Hindi) आप अपने स्कूल या फिर कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल कर सकते है। आपको हमारे इस वेबसाइट पर और भी कही विषयो पर हिंदी में निबंध मिलेंगे, जिन्हे आप पढ़ सकते है।


सूखा पर निबंध (Drought Essay In Hindi)


प्रस्तावना

अकाल कहे या सूखा, ये अभाव की स्थति में पैदा होता है। सामान्य रूप से जब मनुष्यो के लिए खाने – पिने की वस्तुओ की कमी हो जाती है। तथा पशुओ के लिए भी चारे – पानी का अभाव उत्पन्न होता है, तो उसे अकाल कहा जाता है।

सूखा पड़ने के मुख्य रूप से दो कारण होते है। एक बनावटी तथा दुसरा प्राकृतिक। बनावटी प्रकार का सूखा मुख्य रूप से प्रायः उत्पादकों तथा व्यापारियो द्वारा पैदा किया जाता है। और इसके विपरीत जब अनाज, पानी व चारा आदि की जब कमी हो जाती है, तो उसे प्राकृतिक रूप का सूखा कहा जाता है।

सूखे के प्रकार

वैसे तो सूखा तीन प्रकार के होते है। लेकिन परोधिकी विदो ने इसे चार भागो में विभाजित किया है, जो इस प्रकार है।

(1) क्लाईमेटेलजिकल ड्राट – जिसका अर्थ होता है, जलवायु सूखा।

(2) हाइड्रोलॉजिकल ड्राट – जिसका अर्थ होता है, जल विज्ञानं द्वारा सूखा।

(3) एग्रीकल्चर ड्राट -जिसका अर्थ होता है, कृषि द्वारा सूखा।

(4) इकोनॉमिक ड्राट – जिसका अर्थ होता है, समाजिक और आर्थिक सूखा।

सूखे की परिभाषा

सूखा एक ऐसी स्थिति को कहा जाता है, जब लम्बे समय तक कम वर्षा होती है और अत्याधिक वाष्पीकरण के कारण जलाशयों तथा भूमिगत जल जो भूमि से प्राप्त होता है, उसके अत्याधिक प्रयोग से जो कमी होती है उसे सूखा कहा जाता है।

सूखा एक जटिल परिघटना है। जिसमे कई प्रकार के मौसम विज्ञानं संबंधी तथा अन्य तत्व जैसे वृष्टि, वाष्पीकरण, वाष्पोतसर्जन, भौम जल, मृदा में नमि, जल भंडार व् भरण, कृषि की पद्धतियाँ, विशेष रूप से उगाई जाने वाली फसले, सामाजिक – आर्थिक गतिविधियां और परिस्थिति को भी सूखे में ही शामिक किया गया है।

सूखे के दो महत्वपूर्ण कारण है

(1) बनावटी सूखा
(2) प्राकृतिक सूखा

बिट्रिश शासनकाल का बनावटी सूखा

बिट्रिश सरकार ने अपने शासन काल में एक बार बंगाल में बनावटी अकाल पैदा कर दिया था। उसने भारतीयों को सबक सिखाने के लिए भारतीय अनाज उत्पादकों और व्यपारियो को अपने साथ मिलाकर खाध पदार्थो का कृतिम अभाव पैदा कर दिया था।

जिसका परिणाम था की बंगाल में हजारों लोग भूख से तड़प -तड़प कर मर गए थे। उस समय मुट्ठी भर अनाज के लिए माताओ ने अपनी संतान को बेच दिया था। उस समय चारे – पानी के आभाव में न जाने कितने पशु बेमौत मारे गए थे।

बनावटी सूखे को पैदा करने के लिए मुनाफाखोर व्यापारी अपने माल को गोदामों में छिपाकर कृतिम अभाव पैदा कर देते है। उनका उदेश्य काले बाजार में माल को बेचकर अधिक मुनाफ़ा कमाना होता है। यह बात दूसरी है की इस प्रकार के सूखे के इतने भयंकर परिणाम न निकलते हो, परन्तु सामान्य मंजूशी को तंगी का सामना करना ही पड़ता है।

प्राकृतिक रूप का सूखा

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है प्रकृतिक रूप से सूखा, या दुर्भिक्ष का पड़ना। जैसे वर्षा का इतना अधिक समय – असमय होते रहना की बोया हुआ बीज अधिक पानी के कारण सड़- गल जाये। या पक्का अनाज बदरंग होकर खाने लायक न रह जाए।

उसी प्रकार सूखा पड़ने अर्थात वर्षा के बहुत कम होने या न होने से खेती नहीं हो पाती है। उस वक़्त भी मनुष्य व् पशुओ के लिए अन्न व् चारे तथा पानी की समस्या उत्पन्न हो जाती है, जिसे प्राकृतिक सूखा कहते है।

ऐसी स्थिति में मनुष्य की प्यास बुझाने वाले स्त्रोत कुंए आदि सूख जाते है। पशुओ की प्यास बुझाने वाले जोहड़ – तालाब आदि सुख जाते है। चारो ओर हां – हाकार मच जाता है। वर्षा का अभाव घास – पत्तो तक को सुखाकर धरती को बंजर जैसी बना देता है।

धरती धूल बनकर उड़ने लगती है। यंहा – वहां मरे पशुओ व् मनुष्यो की लाशो को मांसाहारी पशु नोचने लगते है। अशक्त हुए लोग अपने किसी सगे- संबंधी का अंतिम संस्कार कर पाने में समर्थ नहीं रह पाते है।

परिणामतः उनकी लांशे घरो में पड़ी सड़ने लगती है। इसके कारण हमारा पर्यावरण भी दूषित होने लगता है। ऐसी स्थिति में यदि सरकारी सहायता भी न मिले तो सोचिये क्या हाल हो। परन्तु ऐसी परिस्थिति से लड़ने के लिए हम मनष्यो को पहले से ही तैयार रहना पड़ेगा। इसके लिए पर्यावरण को दूषित होने से बचाना होगा, ताकि सूखे की भयंकर परिस्थिति उत्पन्न ही ना हो।

सबसे अधिक सूखे का रूप

सन 1987 का जून का महीना था और लोग उम्मीद कर रहे थे की बस अब मानसून आने वाला है। धरती माता की अब प्यास बुझने वाली है। गर्मी से हमे राहत मिलने वाली है। तथा खेतो में फसंले लहलहायेंगी। और उसी समय पश्चिम बंगाल, असम और बिहार में वर्षा आरम्भ हो चुकी थी और वहा की प्रमुख नदियों में बाढ़ आ गयी थी।

साथ ही पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश के लोग अभी आकाश की और मुंह किये बादलो के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। रेडियो पर सावन के गाने आरम्भ हो चुके थे। लेकिन भयंकर गर्मी एवं सूखे की स्थिति में पता लग ही नहीं पा रहा था की महीना सावन का है या जेठ का।

सुखी जमीन के ऊपर सूखे पेड़ो की डालियो में लटकते झूले किसी विधवा स्त्री की मांग की भाँती सुने सुने नजर आ रहे थे। जुलाई तो क्या अगस्त का महिना समाप्त होने को आया लेकिन मौसम विशेषज्ञों की सभी धारणाओं एवं किसानों की सभी आशाओं पर पानी फिर गया।

कभी – कभी आकाश में बादल आकर आधुनिक राजनीतिज्ञों की भाँती आश्वासन जरूर दे जाते थे। लेकिन लगता था की बादलो को भी पता लग चुका है की आश्वासन केवल आश्वासनों के लिए होते है।

उनको पूरा किया जाना आवश्यक नहीं होता है। वर्षा न होने के कारण पुरे देश को भयंकर सूखे ने अपनी लपेट में ले लिया। पिछले सेंकडो वर्षो में इतना भयंकर सूखा नहीं पड़ा था। और सदी का सर्वघाती सूखा देश के दो तिहाई से अधिक भाग में फेला हुआ था।

सूखा पड़ने के कारण

(1) वनो की कटाई
(2) वर्षा का अभाव
(3) भूमिगत जल का अत्याधिक उपयोग
(4) वर्षा के पानी का संचय ना करना
(5) तीव्र जनसंख्या
(6) उपभोक्ता
(7) मरुस्थल को नियंत्रित ना कर पाना

वनो की कटाई

सूखे का सबसे महत्वपूर्ण कारण वनो की कटाई है। जबकि ये हम भलीभांति जानते है की वन विशेषताओं के स्त्रोत है। ये वर्षा लाने में सहायता करते है। ये सुखी और ठंडी हवाओ को रोकते है। ये वातावरण को शुद्ध करते है।

परन्तु इतना सब जानने के बावजूद वनो की अंधाधुंध कटाई की जाती है। जिसके फलस्वरूप सूखे जैसी गंभीर समस्या उत्पन्न होती है। जिसका खामियाजा सभी को भोगना पड़ता है। इसलिए सबसे पहले वनो की कटाई पर रोक लगाना होगा।

वर्षा का अभाव

अब ये बात तो आप सभी को पता है की वनो की कटाई होंगी तो वर्षा नहीं होगी और फिर वही सूखे की संभावना बढ़ जाती है। वर्षा का औसत से कम होना और सही समय पर ना होना भी सूखे का कारण है।

भूमिगत जल का अत्याधिक उपयोग

भूमिगत जल उसे कहा जाता है जो सामान्यतः धरती की सतह के नीचे चट्टानों के कणों के बीच मौजूद होता है और उसे मुख्य रूप से कुओ अथवा हैंडपंप द्वारा खुदाई करके प्राप्त किया जाता है। भूमिगत जल का प्रयोग अत्याधिक किया जाता है।

बढ़ती जनसंख्या और खाध की आवश्यकताओ के लिए नए बीजो की सघन खेती की जा रही है। और इसका प्रयोग बारम्बार किया जाता है और इतने अधिक प्रयोग से भूमिगत जल की सतह निचे होती जाए रही है। साथ ही भूमिगत जल प्रदूषित भी हो रहा है, जिसके कारण सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

वर्षा के पानी का संचय ना होना

हमारे देश की एक सबसे अधिक परेशानी का कारण यही है की जल को अधिक बर्बाद किया जाता है। इसका एक उदाहरण हम वर्षा के पानी का ले सकते है। इसका संचय बिलकुल नहीं किया जाता।

केवल तमिलनाडु राज्य ही है जंहा इसका संचय किया जाता है। इसलिए जब हमारे देश में सूखे जैसी परिस्थिति पैदा होती है, तो हम उसे बचाने में असमर्थ होते है। क्युकी हमने जल का संचय किया ही नहीं होता। इसलिए जल का संचय करना सूखे से बचने का एक बहुत अच्छा रास्ता हो सकता है।

तीव्र जनसंख्या

सूखे का एक कारण जनसख्या का बढ़ना भी हो सकता है। जब जनसंख्या अधिक होंगी तो खाना, पानी और रहने के लिए जगह की आवश्यकता अधिक होंगी। तो ये किस पर निर्भर होंगे? ये सारी चीजे वन, खेती और हमारे पर्यावरण पर ही निर्भर होंगे।

रहने के लिए घर चाहिए और घर के लिए लकड़ी, खाने के लिए अनाज चाहिए जो पानी पर ही निर्भर है। लेकिन जब लकड़ी के लिए वन काटे जायेंगे और इससे बारिश का अभाव होगा।तो नाही बारिश होगी और ना ही खेती के लिए पर्याप्त पानी मिलेगा। इसलिए सूखे को रोकने के लिए जनसंख्या की गति पर रोक जरूरी है।

उपभोक्ता

सबसे पहले हमे जानना होगा की उपभोगता होता क्या है। उपभोक्ता उसे कहते है जो विभिन्न वस्तुओ एवं सेवाओं का उपभोग करता है। ये वस्तुए जैसे गेंहू, आटा, दाल, चावल, नमक आदि है। यह सब खेती के जमीन से आते है और इस जमीन को पनपने के लिए जल की ही आवश्यकता होती है।

लेकिन करोड़ो की जनसंख्या वाले हमारे देश में बिना किसी नियमो के पालन के बजह से ही सूखे की समस्या उत्पन्न होती है। इसलिए प्रत्येक उपभोक्ता का पहला कर्तव्य है की जिन चीजों का वो उपभोग करेंगा, उसके उत्पादन में भी अपना योगदान अपनी समझ और सूझ के साथ दे। ताकि हमारे देश को सूखे जैसी परिस्थिति से जूझने की नौबत ही ना आये।

मरुस्थल को नियंत्रित ना कर पाना

मरुस्थलों को नियंत्रित करने के उचित परियोजनाओ का हमारे देश भारत में अभाव है। जो की बिलकुल गलत है। और इसी से निपटने के लिए नई – नई परियोजना बननी चाहिए, जो सूखे को रोक सके।

उपसंहार

सूखा एक विनाशकारी और भयंकर प्राकृर्तिक आपदा है। ये हम मनुष्य और हमारे पर्यावरण तथा वनस्पति को अत्यधिक नुक्सान का कारण है। इस सूखे से लड़ने के लिए हम सभी को आपस में एकजुट होकर लड़ना होगा, ताकि हम मानव इस सूखे जैसी गंभीर समस्या से लड़े भी और जीते भी।


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