भगत सिंह पर निबंध (Bhagat Singh Essay In Hindi)

आज के इस लेख में हम भगत सिंह पर निबंध (Essay On Bhagat Singh In Hindi) लिखेंगे। भगत सिंह पर लिखा यह निबंध बच्चो और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

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भगत सिंह पर निबंध (Bhagat Singh Essay In Hindi)


प्रस्तावना 

भारत को आजाद कराने के लिए बहुत से ही स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। ऐसे ही स्वतंत्र सेनानियों में भगत सिंह का नाम भी आता है, जो भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी रहे थे।

भगत सिंह ने चंद्रशेखर आजाद और उनकी पार्टी के साथ मिलकर देश की आजादी के लिए बड़े साहस पूर्वक ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया था। भगत सिंह ने सबसे पहले सांडर्स की हत्या कर दी, उसके बाद में दिल्ली संसद में बम विस्फोट किया।

यह बम विस्फोट ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध था। भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंका और उसके बाद वहां से भागने से मना कर दिया। जिसके कारण इन्हें और उनके साथियों को राजगुरु और सुखदेव के साथ में फांसी पर लटका दिया गया था।

आज सारा देश इनके बलिदान की गाथा गाता हैं। भगत सिंह का दिया हुआ बलिदान आज भी इतिहास में लिखा गया है। इन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की।

भगत सिंह का जन्म

भगत सिंह का जन्म 19 अक्टूबर 1996 हुआ था। भगत सिंह के पिता जी का नाम सरदार किशन सिंह संधू था और उनकी माता का नाम विद्यावती कौन था। भगत सिंह जाट समाज से संबंध रखते थे।

जब अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को जग जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, तो भगत सिंह की सोच पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। भगत सिंह जी ने जलिया वाले बाग हत्याकांड के बाद लॉकिंग नेशनल कॉलेज की पढ़ाई को छोड़कर भारत को आजादी दिलाने के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना कर दी थी।

काकरोली कांड

जब काकरोली कांड हुआ तो उसमें राम प्रसाद बिस्मिल के साथ में चार क्रांतिकारियों को फांसी दे दी और 16 अन्य लोगों को कारावास की सजा दी। जिसके कारण भगत सिंह को अधिक गुस्सा आया और उन्होंने चंद्र शेखर आजाद के साथ में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में जुड़ गए।

उन्होंने इसका एक नया नाम दिया हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। भगत सिंह द्वारा इस एसोसिएशन में जुड़ने के बाद इस संगठन का उद्देश्य सेवा त्याग पीड़ा झेल सकने वाले नव युवकों को आजादी की लड़ाई के लिए तैयार करना था।

भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 14 दिसंबर 1926 में लाहौर में अंग्रेज अधिकारी के पुलिस अधीक्षक सांडर्स को मार दिया था। सांडर्स को मारने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने इनकी मदद की थी।

जब उन्होंने सेंट्रल असेंबली के संसद भवन के अंदर बम फेंकने की योजना बनाई, तब बटुकेश्वर दत्त ने इनका साथ दिया था। और भगत सिंह ब्रिटिश सरकार के सेंट्रल असेंबली में जो कि दिल्ली में स्थित थी 4 अप्रैल 1929 को बम और पर्चे देखे थे।

बम फेंकने के बाद भी भगत सिंह ने वहां से भागने से मना कर दिया और उन्हें और उनके दोनों साथियों को ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।

जलियांवाला बाग हत्याकांड

भारत में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था। तब भगत सिंह की उम्र करीब 12 वर्ष की थी। इस बात की सूचना मिलते ही भगत सिंह ने अपने स्कूल को छोड़कर 12 मील की पैदल यात्रा करके जलियांवाला बाग पहुंच गए थे।

जब भगत सिंह 12 साल के थे तब वह अपने चाचा की क्रांतिकारी किताबों को पढ़ा करते थे। भगत सिंह हमेशा विचार करते थे कि यह रास्ता सही है या नहीं। जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को रद्द कर दिया था तो इनके अंदर थोड़ा गुस्सा उत्पन्न हुआ था, परंतु यह पूरे देश की तरह गांधी जी का सम्मान करते थे।

इन्होंने बहुत से जुलूस में भाग लेना शुरू कर दिया था और बहुत से क्रांतिकारी दलों के सदस्य बन चुके थे। इनके क्रांतिकारी दोनों में से चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव और राजगुरु खास थे।

साइमन कमीशन का बहिष्कार

जब देश में साइमन कमीशन का बहिष्कार चल रहा था, तब ब्रिटिश सरकार ने प्रदर्शन करने वाले लोगों पर लाठी चार्ज कर दी थी। इस लाठीचार्ज के अंदर लाला लाजपत राय जी की मृत्यु हो गई थी। लाला लाजपत राय जी की मृत्यु के बाद इनसे रहा नहीं गया था और एक गुप्त योजना बनाई, उन्होंने पुलिस सुपरीटेंडेंट स्कॉट को मारने की योजना बना ली।

इनके द्वारा सोची गयी योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु दोनों कोतवाली के सामने घूम रहे थे और दूसरी तरफ जय गोपाल अपनी साइकिल को ठीक करने का बहाना कर रहे थे।

सोची गई योजना के अनुसार जय गोपाल ने जब भगत सिंह और राजगुरु को इशारा किया तो दोनों सचेत हो गए। इस योजना के अंदर चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे जो चारदीवारी के पीछे छिपकर घटना को अंजाम देने वाले लोगों की रक्षा का काम कर रहे थे।

जैसे ही एसपी सांडर्स आते हुए दिखे तो सतगुरु ने गोली सीधी सर के अंदर मारी जिसके बाद सांडर्स बेहोश हो गया। वीर भगत सिंह ने तीन चार गोलियां दागकर उन्हें मार दिया। जब यह भाग रहे थे तो एक सिपाही चरण सिंह ने उनका पीछा किया।

चंद्रशेखर जी ने सावधान किया और कहा आगे बढ़े तो गोली मार दूंगा। परंतु चरण सिंह ने उनकी बात नहीं मानी तो चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें गोली मार दी इस तरह भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मोत का बदला लिया।

जेल के अंदर की कहानी

भगत सिंह ने जब असेंबली के अंदर बम फेंका उसके बाद वहां से भागे नहीं, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार करने के बाद भगत सिंह को करीब 2 साल तक जेल में रखा गया। जेल के अंदर भगत सिंह अपने क्रांतिकारी विचारों से व्यक्त सभी विचारों को लेख में लिखते थे।

जब भगत सिंह जेल में रहते थे तब भी उन्होंने अपना अध्ययन लगातार जारी रखा। उनके द्वारा लिखे गए लेखों को उनके संबंधियों को भेज दिया गया था, जो आज भी उनकी जान को दर्पण देते हैं।

भगत सिंह ने बहुत से पूंजी पतियों को अपना दुश्मन बताया था, उन्होंने लिखा था कि चाहे मजदूरों का शोषण करने वाले कोई भी हो। उनके दुश्मनों पर उन्होंने जेल में अंग्रेजी में एक लेख लिख दिया जिसका नाम था मैं नास्तिक क्यों हूं।

जेल के अंदर भी भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ में 64 दिनों तक भूख हड़ताल कर ली। इस भूख हड़ताल के अंदर उनके साथी यतींद्र नाथ दास ने अपने प्राण दे दिए।

फांसी के लिए माफी

भगत सिंह को 26 अगस्त 1930 में अदालत में भारतीय कानून के अनुसार धारा 129 व 302 के तहत और धारा चार और 6 कि धारा 120 के तहत अपराध करने के जुर्म में प्रति घोषित कर दिया।

7 अक्टूबर 31 को अदालत में 68 पन्नों का निर्णय लिया गया, जिसके अंदर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी सुनाने का फैसला किया गया। इन्होंने फांसी की सजा सुनाई जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी।

इसके बाद में भगत सिंह ने फांसी की माफी के लिए हाई परिषद में भी अपील कि परंतु 10 जनवरी 1931 को इसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद में कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय के द्वारा वायसराय से माफी मांगने का निर्णय लिया।

जब 14 फरवरी 1931 को उन्होंने माफी के लिए अपील दायर करी, तो उन्होंने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के लिए फांसी की सजा माफ करने के लिए अपील की।

भगत सिंह की फांसी की सजा रोकने के लिए महात्मा गांधी ने भी वायसराय से बात की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था और भगतसिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए।

फासी का समय

जब 23 मार्च 1931 को शाम 7:00 बचकर 33 मिनट पर भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई, तब उन्होंने फांसी पर चढ़ने से पहले उनकी आखिरी इच्छा पूछी गई। तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, बस उन्हें उसे पूरा करने का समय दिया जाए।

परंतु फांसी का समय नजदीक आ चुका था तो उन्होंने मना कर दिया। पहले उन्होंने कहा रुको क्रांतिकारियों को एक दूसरे से मिलने दो फिर 1 मिनट बाद में उन्होंने किताब को ऊपर छत पर रेखा और कहां ठीक है और भगत सिंह और उनके साथी ने मस्ती से गीत गया।

वह गीत था मेरा रंग दे बसंती चोला। फांसी के बाद में कोई आंदोलनकारी भड़क ना जाए इसलिए अंग्रेजों ने डरकर पहले भगत सिंह और उनके साथियों के टुकड़े किए फिर बोरी में भर के फिरोजपुर गए।

वहां पर जाकर उन्होंने मिट्टी का तेल डालकर जलाया। जब गांव वालों ने आंखों देखा तो पास में आए। जब गांव वालों को पास आता देखकर अंग्रेजों को डर लगा तो उनको आधा जलाकर सतलुज नदी के अंदर फेंक कर भाग गए। जब सभी गांव वाले पास में आए तो उन्होंने उन टुकड़ों को इकट्ठा किया और विधिवत रूप से उनका दाह संस्कार किया।

निष्कर्ष

आज भी जब भगत सिंह जी के इस बलिदान को पढ़ा जाता है या सुना जाता है, तो भारत के हर उस नौजवान के अंदर अंग्रेजो के खिलाफ गुस्सा पैदा हो जाता है। भगत सिंह के बलिदान को भारत कभी नहीं भूल सकता। भगत सिंह ने प्राण देकर देश को आजाद कराने में अपनी भूमिका निभाई थी। आज भगत सिंह का नाम सुनहरे अक्षरों में इतिहास में लिखा गया है।


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तो यह था भगत सिंह पर निबंध, आशा करता हूं कि भगत सिंह पर हिंदी में लिखा निबंध (Hindi Essay On Bhagat Singh ) आपको पसंद आया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा है, तो इस लेख को सभी के साथ शेयर करे।

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